गणेशोत्सव को लेकर पारंपरिक प्रतिमा बैठाने का निवेदन, कार्टून और मूल से अलग रूप की प्रतिमा बैठाने और फ़िल्मी गीत बजाने पर हिन्दू संगठनों ने दी चेतावनी।

बलौदाबाजार : प्रथम पूज्य भगवान गणेश के आगमन को लेकर जिले में तैयारियां अंतिम चरण में हैं। 14 सितंबर से शुरू होने वाले दस दिवसीय गणेशोत्सव के लिए शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक समितियां भव्य पंडाल सजाने में जुटी हैं, वहीं मूर्तिकार प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं। इस उत्साह के बीच प्रतिमाओं के स्वरूप को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। आधुनिकता और आकर्षण के नाम पर बनाई जा रही कार्टून व फिल्मी थीम की प्रतिमाओं पर हिंदू संगठनों, पुजारियों और धर्मप्रेमियों ने कड़ा ऐतराज जताया है।

मूल और शास्त्रसम्मत स्वरूप की मांग :

धर्मप्रेमियों का स्पष्ट कहना है कि भगवान गणेश का स्वरूप सनातन मान्यताओं और शास्त्रों से बंधा है। गजमुख, लंबोदर, चतुर्भुज रूप, मस्तक पर तिलक और हाथों में आयुध ही बप्पा की वास्तविक पहचान हैं। आधुनिकता के नाम पर इनके स्वरूप से छेड़छाड़ करना अनुचित है। मूर्तियों के निर्माण और सजावट में शास्त्रसम्मत गरिमा का पूरा पालन होना चाहिए।

फिल्मी और कार्टून थीम पर क्यों उठ रहे सवाल?

बीते कुछ वर्षों में मूर्तियों को अलग-अलग थीम देने का चलन बढ़ा है। कहीं गणेश जी को सुपरहीरो, कार्टून कैरेक्टर तो कहीं फिल्मी किरदारों के रूप में ढाला जाता है। जानकारों का कहना है कि:

  • ऐसी प्रतिमाएं तात्कालिक आकर्षण का केंद्र तो बन जाती हैं, लेकिन इनसे धार्मिक मर्यादाएं आहत होती हैं।
  • उत्सव की मूल भावना मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी आस्था और भक्ति है।

प्रमुख प्रतिक्रियायें :

“मूल स्वरूप से छेड़छाड़ आस्था के साथ खिलवाड़”

“भगवान गणेश को उनके मूल स्वरूप से हटाकर किसी अन्य पात्र के रूप में प्रस्तुत करना धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ है। पूजा की परंपराएं सदियों पुरानी हैं, इसलिए प्रतिमा स्थापना में मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए।”

अभिषेक मिश्रा, पदाधिकारी, विश्व हिंदू संगठन

“मर्यादा और परंपरा का सम्मान जरूरी”

“गणेशोत्सव विशुद्ध रूप से आस्था का पर्व है। श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे भगवान को उनके पारंपरिक स्वरूप में ही विराजित करें। स्थापना से लेकर विसर्जन तक धार्मिक मर्यादा बनी रहनी चाहिए।”

पुजारी, संकट मोचन मंदिर, बलौदाबाजार

“फ़िल्मी और अश्लील गीतों की सख्त मनाही”

“गणेशोत्सव विशुद्ध रूप से आस्था का पर्व है ऐसे में सिर्फ धार्मिक गीत ही बजाये जाने चाहिये और फ़िल्मी अश्लील और मिलावटी भजनों से भी बचना चाहिये, फ़िल्मी और अश्लील गीत बजाने पर क़ानूनी कार्यवाही भुगतनी पड़ सकती है।”

राज विक्रम केवलानी श्री राम सेना, रायपुर

मूर्तिकारों का रुख और पर्यावरण संरक्षण की पहल :

स्थानीय मूर्तिकारों के अनुसार, इस बार श्रद्धालुओं की मांग के अनुरूप काम करते हुए भी पारंपरिक स्वरूप और पर्यावरण का विशेष ख्याल रखा जा रहा है:

  • माटी की प्रतिमाओं को प्राथमिकता: प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) के स्थान पर शुद्ध मिट्टी से बनी प्रतिमाओं पर जोर है, जिससे जल स्रोतों को नुकसान न पहुंचे।
  • पारंपरिक आकृतियां: मूर्तिकारों का कहना है कि वे समितियों को मूल स्वरूप वाली मूर्तियां चुनने के लिए ही प्रेरित कर रहे हैं।

निष्कर्ष: परंपरा और भव्यता का संतुलन :

गणेशोत्सव सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना का पर्व है। ऐसे में समितियों और श्रद्धालुओं की यह साझा जिम्मेदारी बनती है कि वे पंडालों की भव्यता के साथ-साथ बप्पा के शास्त्रसम्मत स्वरूप और पर्यावरण की रक्षा का पूरा संतुलन बनाए रखें।