‘तूतक तूतक तूतिया हो जमालो’ सिंध की संस्कृति से जुड़े इस गीत को आपने कई बार सुना होगा, ‘जमालो’ कौन था जानते हैं?

मनोरंजन : गीत-संगीत इंसानी जीवन के महत्वपूर्ण अंग है, जो कई बार सुकून देते है तो कई बार खुशियों को दुगुना कर देते है, कई बार ये उत्साह और जीत के प्रतीक भी बन जाते है। गीत संगीत विभिन्न क्षेत्रों से भी सम्बंधित होते है, ऐसे ही कई गीत आज भी अपनी अहमियत बनाकर रखे हुये है। जिनमें कुछ गाने ऐसे होते हैं, जो कई साल नहीं सदियों का सफर तय करने के बाद भी दिल के तार छेड़ देते हैं। ऐसे ही जश्‍न, उत्‍साह और उमंग से सजा ऐसा ही गीत है ‘तूतक तूतक तूत‍िया’, जिसके बनने की कहानी इस गीत से भी अध‍िक मजेदार है। इसमें देशभक्‍त‍ि भी है, लोककथा है, जिसमें सिन्धी, पंजाबी-ह‍िंदी संस्‍कृति का मेल है। और सबसे खास है इसमें ‘जमालो’ हैं।

गीत-संगीत की सबसे बड़ी खासियत ये होती है कि यह सरहदों से परे है। ठीक उसी तरह, जैसे जावेद अख्‍तर साहब ने 26 साल पहले फिल्‍म ‘र‍िफ्यूजी’ के लिए ल‍िखा था- पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इन्‍हें रोके। आज हम यहां जिस गीत की चर्चा करने जा रहे हैं, उसका इतिहास और कालक्रम भी कुछ ऐसा है। यह गाना है ‘तूतक तूतक तूतिया हो जमालो’, हम सभी ने यह गीत सुना है, गुनगुनाया है और कई बार इस पर झूमे भी हैं। लेकिन क्‍या आपको पता है यह गाना कैसे बना, कैसे यह 19वीं सदी से होते हुए आज भी सुरीला बना हुआ है और सबसे मजेदार, इसका मतलब क्‍या है? खासकर ‘हो जमालो’, जिसे अक्‍सर हम में से कई लोग ‘दही जमालो’ भी गाते हैं। असल में इसका गीत-संगीत भी उत्‍साह-उमंग और जोश बढ़ाने के लिए ही गढ़ा गया था।

‘तूतक तूतक तूतिया’ मूल रूप से एक पारंपरिक सिंधी लोकगीत ‘हो जमालो’ है, जिसे पंजाबी पॉप सिंगर मलकीत सिंह ने अपनी आवाज देकर दुनियाभर में मशहूर कर दिया था। ‘हो जमालो’ पाकिस्तान के सिंध प्रांत का एक प्रसिद्ध लोकनृत्य और गीत है। इस गाने में जिस ‘हो जमालो’ को कई लोग ‘दही जमालो’ कहते हैं, वह असल में 19वीं सदी का एक स्थानीय लोक नायक, जमालो खोसो बलूच या जमालो शीदी है, जिसकी बहादुरी और जीत के जश्न के तौर पर यह गीत गाया जाता था। यह उस समय सिंध का एक प्रसिद्द नायक था और क्षेत्रीय संस्कृति से जुड़ गया था।

हिंदी फिल्‍मों में ‘तूतक तूतक तूतिया’ गाना :

हिंदी के श्रोताओं में ‘तूतक तूतक तूतिया’ गाने की लोकप्रियता बॉलीवुड फिल्‍म ‘घर का चिराग’ ने बढ़ाई। साल 1989 में चंकी पांडे और नीलम पर इस गाने को फिल्माया गया। इसे आशा भोसले और अम‍ित कुमार ने गाया था। बाद में 2016 में इस गाने का एक नया वर्जन ‘तूतक तूतक तूतिया’ भी बड़ा हिट हुआ था। यह इसी नाम की फिल्‍म का टाइटल ट्रैक था, जिसमें प्रभुदेवा, तमन्ना भाटिया और सोनू सूद थे। गाने को मलकीत स‍िंह ने ही कन‍िका कपूर के साथ गाया, वहीँ आज भी यह गीत बिल्कुल तरोताजा अनुभव करवाता है।

‘तूतक तूतक तूतिया’ का मतलब :

वैसे तो ‘तूतक तूतक तूतिया’ का सही मायने में कोई शाब्‍द‍िक अर्थ नहीं है। यह बस एक लय है, जो सुनने में आकर्षक लगता है। ऐसे समझ सकते हैं कि इसे मुख्य रूप से भांगड़ा और पॉप म्‍यूजिक में लोगों को थिरकाने के लिए लयबद्ध किया गया है। सिंध के बेहद प्रसिद्ध लोकगीत ‘हो जमालो’ को जब 1988 में सिंगर मलकीत सिंह ने गाया, तब गीतकार वीर रहीमपुरी इसे पंजाबी भांगड़ा के अंदाज में ढालने के लिए इसमें ‘तूतक तूतक तूतिया’ जोड़ा। बाद में बाली सागू ने इसे ‘हे जमालो’ के तौर पर रीमिक्स किया है। गीत संगीत में कई शब्द बिना किसी मतलब के जरूरत के आधार पर पिरोये जाते है, जो लय और ताल से सम्बंधित होते है।

जमालो कौन था?

जमालो खोसो बलूच, जिनके नाम प्रेरित होकर सिंध प्रांत में लोकगीत ‘हो जमालो’ बना, इसको लेकर दो तरह के किस्‍से या यह कहें कि दो किंवदंतियां हैं। ये ऐसी पारंपरिक कहानी या पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती बातें हैं, इसका कोई पुख्ता लिखित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पहली लोककथा के मुताबिक, यह बात 1887 की है। तब सिंध (अब पाकिस्तान) के सक्‍खर इलाके में अंग्रेजी हुकूमत ने एक रेलवे पुल बनाया था। यह लैंसडाउन पुल सिंध नदी पर था, उसकी गहराई बहुत थी और पानी का बहाव भी उतना ही तेज। अब भारी-भरकम खर्च से यह पुल तो बन गया, लेकिन इसकी मजबूती की जांच करना भी जरूरी था, खासकर रेलगाड़ी के गुजरने से पहले। कोई भी ड्राइवर उस पुल से रेलगाड़ी ले जाने को तैयार नहीं था। अंग्रेजी हुकूमत को कोई ऐसा इंसान चाहिए था, जो मौत पर खेल जाये। यहीं पर प्रवेश होता है जमालो शीदी नाम के शख्‍स की।

तत्कालीन एक कथा के मुताबिक, जमालो शीदी उस समय अंग्रेजों की जेल में एक कैदी था। उसे मौत की सजा सुनाई गई थी। अंग्रेज अफसरों को पुल की मजबूती की जांच के लिए एक शेर-दिल की तलाश थी। जब यह खबर जमालो तक जेल में पहुंची, तो उसने यह खतरा मोल उठाने के लिए हामी भर दी। लेकिन उसकी एक शर्त थी। उसने अफसरों ने कहा कि अगर वह इस पुल से गाड़ी ले जाये\ तो उसकी मौत की सजा माफ करनी होगी। अंग्रेज मान गये और उसे ये मौका दे दिया गया।

जमालो ने दो महीने बाद दौड़ा दी रेलगाड़ी, गूंज उठा ‘हो जमालो’ :

अब जमालो शीदी को पहले रेलगाड़ी चलाने की ट्रेनिंग दी गई। दो महीने की कड़ी तैयारी के बाद वह पुल पर रेलगाड़ी लेकर निकल पड़ा। उसने सफलतापूर्वक इस काम को अंजाम दिया। मौत की सजा माफ हुई और जमालो अपने गांव सिंध लौट आया। जब तक वह घर लौटा, उसकी बहादुरी की कहानी मशहूर हो गई थी। उसके आने की खुशी अलग। वह बहादुरी की मिसाल बन गया और यहीं से परिवार और गांव वालों ने जमालो शीदी के लौटने पर लोगों ने खुशियाँ मनाई, वहां सिन्धी में कहा जाने लगा ‘हो जमालो’ और ‘वाह जमालो’ कहते हुए गाना गाया। इस तरह इस मतलब हुआ कि सलामती से जमालो ने अपना कार्य सिद्ध कर दिया और जिन्दा वापस लौट आया है।

जामालो खोसा बलोच की दूसरी कहानी : कबीले का रक्षक

‘हो जामालो’ गीत के दूसरी लोकप्रिय कहानी में जमालो खोसो बलूच हैं, जिन्‍हें ‘कबीले का रक्षक’ भी कहा जाता है। इसके मुताबिक, जमालो अंग्रेजों की जेल में कोई कैदी नहीं, बल्कि एक बहादुर सिपाही थे, जिन्होंने कई लड़ाइयां लड़ीं। यह लोकथा बताती है कि जमालो एक बहादुर योद्धा थे, जिन्‍होंने बाहरी हमलावरों और मवेशी चोरों से अपने गांव या कबीले की रक्षा की।

जमालो की बहादुरी के आगे फीके पड़ गए थे अंग्रेज :

जब सिंध में एक समय पर बहुत से अंग्रेजों ने आक्रमण कर दिया था, तब वहां के लोग इससे बहुत परेशान हो गए। वहीं रहने वाले जमालो खोसो बलूच ने इन विदेशी ताकतों यानी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्‍होंने कबीले के ही कुछ वीर साथ‍ियों के साथ अपनी छोटी सी टुकड़ी बनाई और अंग्रजों को ‘दांतों तले चने चबाने’ पर मजबूर कर दिया। उनकी असीम वीरता और बुद्धि को देखते हुए ही उस इलाके की महिलाओं ने ‘हो जमालो, “जेको खट्टी आयो खैर से सां” यानी ओ जमालो, तुम विजय होकर वापस आए हो, गाना शुरू कर दिया। उनके सम्मान में गीत के साथ-साथ आजादी के उत्‍साह में लोकनृत्य भी हुआ और यहीं से ‘हो जमालो’ का नारा एक गीत बन गया था।


ब्रिटिश दस्‍तावेजों में जमालो कैदी का जिक्र नहीं :

यहां एक बार फिर से बताते हैं कि ये लोक कथाएं हैं। इनका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। ये सांस्कृतिक रूप से जरूर महत्वपूर्ण बनी हुई हैं, लेकिन शोधकर्ताओं और सिंधी विद्वानों का कहना है कि सक्‍खर पुल पर ट्रेन चलाने वाले ‘जमालो’ नाम के कैदी का कोई आधिकारिक ब्रिटिश प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं है। उनका तर्क है कि जमालो का किरदार बहादुरी और जीत का प्रतीक है, जिसके सही नाम और मूल को अलग-अलग क्षेत्रीय मौखिक परंपराओं में अलग-अलग तरह से बताया गया है। कुछ लोगों ने बताया है कि अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को हर तरह से मिटाने का काम किया था, जिसके कारण इसका कोई प्रमाण मौजूद नहीं है, लेकिन उस ज़माने के लोग इसे आज भी मानते आये है।

‘हो जमालो’ गाना पहली बार कब रिकॉर्ड हुआ?

‘हो जमालो’ गाना वैसे तो एक लोकगीत है, लेकिन इसकी पहली रिकॉर्डिंग 1947 में आबिदा परवीन ने सिंधी भाषा में और शाजिया कुश्क ने उर्दू भाषा में की थी। उसके बाद से इस गाने के कई वर्जन बने। समय के साथ यह सिंधी से हटकर पंजाबी गाना बन गया। यही नहीं, हाल के बरसों में ‘कोक स्टूडियो पाकिस्तान’ के सीजन-11 में अली सेठी और हुमैरा अरशद ने भी इस गाने का पंजाबी वर्जन गाया।