रायपुर नगर निगम में भ्रष्टाचार चरम पर, महापौर पर भी लगे गंभीर आरोप, ठेकेदारों ने कहा : बिना कमीशन नहीं होता भुगतान, अधिकारी, जोन अध्यक्ष, पार्षद के रेट अलग-अलग।

रायपुर : विकास कार्यों में आपको सबसे पहले एक बात स्पष्ट कर दें कि सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है, जहाँ रिश्वतखोरी ना हो, लेकिन इसके जिम्मेदार सिर्फ अधिकारी वर्ग नहीं है, बल्कि इनमें स्थानीय नेता ही प्रमुख होते है, एक अधिकारी ने नाम ना छापने कि शर्त पर बताया है कि किसी भी कार्य में 50% से ज्यादा खर्च अधिकारी, नेता, स्थानीय पार्षद, जोन अध्यक्ष एवम् अन्य वर्ग को जाता है, अगर ऐसा ना करो तो ठेकेदारों का भुगतान रुक जाता है और उन्हें परेशान किया जाता है, यह विकास कार्यों के पीछे होने वाली कड़वी सच्चाई है। वहीँ राजधानी कि सफाई व्यवस्था चरमराई हुई है और जनता पर टैक्स का बोझ भी बढ़ गया है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर ढांक के तीन पांत है, इधर रायपुर नगर निगम के ठेकेदार भुगतान नहीं मिलने से परेशान हैं. आक्रोशित ठेकेदारों का आरोप है कि बिना चढ़ावा कमीशन दिये फाइलें आगे नहीं बढ़ रही है। भुगतान महीनों और सालों से अटका हुआ पड़ा है और गुणवत्ताहीन कार्य का ठीकरा उनके सिर फोड़ा जा रहा है, जबकि अधिकांश पैसा अधिकारियों कि जेबों में जाता है, जिससे मजबूरन हमें कार्य कि गुणवत्ता में कमी करनी पड़ती है, वहीँ काम बंद करने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन सुनवाई नहीं होने पर आज काम बंद कर नगर निगम के सामने प्रदर्शन करने को मजबूर हैं, तो वहीं ठेकेदारों ने नगर निगम कमिश्नर और महापौर पर भी गंभीर आरोप लगाये हैं।

ठेकेदारों के मुख्य आरोप :

भुगतान में भारी देरी : 100 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान लंबित है, जिससे कर्मचारियों को मासिक वेतन देने में दिक्कत आ रही है, कई ठेकेदारों को 6 महीने, 1 साल या डेढ़ साल से भुगतान नहीं हुआ है, वो फिर भी लगातार काम कर रहे है। ठेकेदारों का कहना है कि बाजार बैंक से कर्ज लेकर काम करने वाले ठेकेदार ब्याज के चंगुल में फंसे हैं जबकि निगम के अधिकारी जमा राशि पर ब्याज का गोरख धंधा कर रहे हैं।

हर फाइलों का अलग रेट : हर फाइल का अलग-अलग रेट तय है। 30-40% तक कटौती का आरोप है। 18% GST, 5% सिक्योरिटी आदि कटौतियों के बाद भी अतिरिक्त कट मांगा जाता है। जोन अध्यक्ष और पार्षद भी अपना प्रतिशत तय करते हैं, जिससे उनको भी कमीशन देना पड़ता है, कहते है मेरे जोन में काम करना है तो मेरा कट देना होगा।

तानाशाही और बेगारी : अधिकारियों के लिए बेगारी मुफ्त काम कराने का भी आरोप लगाया गया है, इससे काम समय पर पूरा नहीं होता है तो फिर पेनल्टी ठेकेदारों पर लगाया जाता है, लेकिन समय से पहले काम पर कोई लाभ नहीं मिलता है।

गुणवत्ता और कमीशन : अधिकारी जोन अध्यक्ष और पार्षद कमीशन खाने के बाद गुणवत्ता हीन काम स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन बाद में गड़बड़ी का दोष ठेकेदारों पर मढ़ दिया जाता है, जिससे ठेकेदारों को ब्लैक लिस्टिंग का सामना भी करना पड़ता है, जब आप विकास का पैसा खा लेंगे तो मज़बूत काम कहां से होगा?

कई अधिकारियों के खुल के बताये नाम :

ठेकेदार ने बताया है, सुरेंद्र श्रीवास्तव जोन सात में हैं। मेरे को जबरन 5 लाख का सामान बेचा जो चोरी का समान था, इसके कारण मेरे को जेल जाना पड़ा। इज्जत भी गई और धन भी, एक साल से डेढ़ करोड़ का भुगतान अभी भी अटका हुआ है। कई बार आवेदन दिया लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। हर स्तर के अधिकारियों का अलग-अलग पचास हज़ार से एक लाख रुपए तक रेट तय है। ठेकेदारों का कहना है कि नियम-कानून नहीं है, सिर्फ तानाशाही चल रही है। वे निगम के बाहर धरना, ढोल-ताशा बजाकर सोए अधिकारियों और महापौर को जगाने के लिए बैठे हैं। महापौर हर दूसरे दिन निर्देश दे रही हैं, लेकिन अधिकारी नहीं मान रहे और ना सुन रहे हैं। जिसका खामियाजा भी ठेकेदारों को भुगतना पड़ता है।

कमिश्नर के आने के बाद ज्यादा अव्यवस्था :

ठेकेदार संघ के अध्यक्ष दुर्गेश ने कहा, रिश्वत कमीशनखोरी ये आज की बात नहीं है। निगम का अटल नियम है, लेकिन वर्तमान के हमारे कमिश्नर साहब के आने के बाद और ज़्यादा व्यवस्था बिगड़ी है, उनके ऑडिटर के चैम्बर के बाहर लिखा होता है ठेकेदार हमसे ना मिले, तो कहां और किससे मिले? हमारी फाइल गायब हो जाती है, कहां है पता नहीं चलता है तो हमें तो अधिकारियों के पास जाना पड़े कार्यालय में जाना पड़े कब तक हम अपने काम के पैसा के लिए इंतजार करेंगे? यह पहला मामला नहीं है। पिछले महीनों में सफाई ठेकेदारों ने 4 महीने के बकाए को लेकर हड़ताल की थी, जिससे शहर की सफाई व्यवस्था प्रभावित हुई। पानी टैंकर टेंडर, जमीन फाइलें गायब और अन्य घोटालों के आरोप भी लग चुके हैं।

सुलगते सवाल?

  • क्या रायपुर नगर निगम में सिस्टेमैटिक कमीशन रैकेट चल रहा है, जिसमें अधिकारी, जोन अध्यक्ष और पार्षद शामिल हैं?
  • 100 करोड से ज़्यादा बकाया के बावजूद ठेकेदारों को बैंक ब्याज चुकाना पड़ रहा है, तो निगम के जमा फंड पर कौन ब्याज कमा रहा है?
  • महापौर के निर्देशों की अनदेखी क्यों हो रही है? क्या प्रशासनिक तंत्र महापौर से ज्यादा ताकतवर हो गया है?
  • गुणवत्ताहीन कार्य स्वीकार करने और पेनल्टी लगाने का दोहरा मापदंड क्यों?
  • क्या ईओडब्ल्यू या राज्य सरकार को स्वतंत्र जांच करानी चाहिए?
  • ठेकेदारों का घर-जमीन गिरवी रखकर काम करना और बिना भुगतान के परेशान होना निगम व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. अगर आरोप सही हैं तो यह जनता के टैक्स पैसे का दुरुपयोग है ?

वहीँ इन सब परेशानियों को लेकर सिविल ठेकेदार संघ के अध्यक्ष ने मांग करते हुए कहा, नगरीय निकाय मंत्री और छत्तीसगढ़ सरकार को तुरंत संज्ञान लेना चाहिये, पारदर्शी जांच, बकाया भुगतान और दोषियों पर कार्रवाई से विश्वास बहाल किया जा सकता है। महापौर मीनल चौबे और निगम कमिश्नर संबित मिश्रा को इन सवालों के जवाब लेने के लिए कॉल किया गया, लेकिन खबर बनते तक उनसे कोई जवाब नहीं मिला। महापौर कभी – भी फोन नहीं उठाती है।