कोरबा में मासूम से बर्बरता और हत्या पर फूटा जनआक्रोश : पुलिस अधीक्षक को हटाने की मांग तेज, सामने आई ये घटना….।

कोरबा : छत्तीसगढ़ के ऊर्जाधानी कोरबा जिले अंतर्गत रजगामार क्षेत्र में सात वर्षीय मासूम बालिका के अपहरण, अनाचार और नृशंस हत्या की वीभत्स वारदात ने पूरे अंचल को झकझोर कर रख दिया है। मानवता को शर्मसार कर देने वाली इस जघन्य घटना के सामने आने के बाद समूचे जिले में नागरिकों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। शहर के हृदयस्थल से लेकर सुदूर वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों तक विरोध की तीव्र लहर फैल चुकी है। अधिवक्ता संघ, विभिन्न सामाजिक व स्वयंसेवी संगठन, छात्र संगठन, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक पीड़िता को न्याय दिलाने तथा दोषियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने के लिये लामबंद हो चुके हैं। इस हृदयविदारक घटना ने जिले की संपूर्ण प्रशासनिक चौकसी और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट कहना है कि इतनी छोटी बच्ची के साथ घटित दरिंदगी यह साबित करने के लिये पर्याप्त है कि क्षेत्र में असामाजिक तत्वों के भीतर कानून का भय समाप्त हो चुका है। आक्रोशित जनता की दो-टूक मांग है कि इस प्रकरण में शामिल सभी दरिंदों और आरोपियों के विरुद्ध फास्ट-ट्रैक कोर्ट में मुकद्दमा चलाकर कठोरतम दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाये। इसके साथ ही, यदि सूचना मिलने के बाद भी पुलिस महकमे अथवा स्थानीय प्रशासन के स्तर पर तनिक भी ढिलाई या लापरवाही बरती गई है, तो संबंधित उत्तरदायी अधिकारियों पर भी सख्त विभागीय कार्यवाही की जाये।

बच्ची की गुमशुदगी और पुलिस की कथित शिथिलता पर गंभीर सवाल :

इस पूरे मामले में सबसे दुखद पहलू पीड़ित परिवार द्वारा पुलिस की कार्यशैली को लेकर व्यक्त किया गया आक्रोश है। परिजनों का सीधा आरोप है कि जब बच्ची अचानक लापता हुई थी, तब यदि स्थानीय पुलिस तंत्र तत्परता दिखाता, तत्काल सघन तलाशी अभियान छेड़ता और चारों ओर नाकेबंदी कर तकनीकी सहायता लेता, तो शायद मासूम की जान बचाई जा सकती थी।

परिजनों का कहना है कि आरंभिक घंटों में आवश्यक गंभीरता नहीं दिखाई गई, जिसके परिणामस्वरूप बाद में बच्ची का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। इस विलंब और संवेदनहीन रवैये को लेकर स्थानीय निवासियों में भारी रोष व्याप्त है। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि महिलाओं, बालिकाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा को लेकर पुलिस तंत्र को जिस संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिये था, वह पूरी तरह नदारद दिखा। यदि व्यवस्था में समय रहते व्यापक सुधार नहीं किये गये, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक पाना असंभव हो जायेगा।

जिले में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ठप्प, पुलिस अधीक्षक को पद से हटाने की उठी प्रचंड मांग :

वारदात के बाद कोरबा के पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी की कार्यशैली और प्रशासनिक क्षमता के विरुद्ध असंतोष चरम पर पहुंच गया है। स्थानीय नागरिकों, व्यापारी संगठनों और प्रबुद्ध मंचों द्वारा उन्हें तत्काल प्रभाव से पद से हटाने की मांग पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि वर्तमान पुलिस अधीक्षक के कार्यकाल के दौरान जिले में बुनियादी कानून-व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो चुकी है तथा अपराधियों के हौसले लगातार बुलंद हुए हैं।

प्रदर्शनकारियों ने दस्तावेजी आधार और पूर्व की घटनाओं का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि जिले में संगीन अपराधों—जैसे हत्या, अनाचार, बलात्कार, राहजनी, डकैती और लूटपाट—का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा है। इसके अतिरिक्त, जिले के विभिन्न क्षेत्रों में संगठित गिरोहों द्वारा अवैध रेत उत्खनन, कबाड़ का काला कारोबार और बड़े पैमाने पर डीजल चोरी की गतिविधियां बेखौफ संचालित हो रही हैं, जिन पर प्रभावी अंकुश लगाने में जिला पुलिस तंत्र सर्वथा विफल रहा है। यद्यपि इन आरोपों की किसी स्वतंत्र उच्चस्तरीय एजेंसी से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, किंतु आम जनमानस के बीच पुलिस की छवि को गहरा आघात पहुंचा है।

राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक अनदेखी के आरोपों पर गरमाई सियासत :

इस त्रासदी के उपरांत न केवल धरातल पर बल्कि सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भी यह तीखा विमर्श छिड़ गया है कि आम जनता द्वारा निरंतर शिकायतों, बढ़ते अपराधों और लचर पुलिसिंग के बावजूद शीर्ष नेतृत्व के विरुद्ध अब तक कोई अनुशासनात्मक कदम क्यों नहीं उठाया गया। जनसंवाद और सार्वजनिक चर्चाओं में यह आशंका खुलकर व्यक्त की जा रही है कि उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों को अनुचित राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है, जिसके चलते जनहित के मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि जब जिले में अपराध बेलगाम हो रहे हों और जनता की जान-माल सुरक्षित न हो, तब केवल कागजी आंकड़ों के सहारे शांति का दावा करना प्रशासनिक विफलता को छिपाने का प्रयास मात्र है। यद्यपि राजनीतिक संरक्षण के इन दावों की कोई अधिकृत पुष्टि नहीं हुई है, परंतु जनआक्रोश इस बात का स्पष्ट संकेत दे रहा है कि शासन-प्रशासन के प्रति जनविश्वास रसातल में जा चुका है।

अन्यत्र तबादला नामंजूर, प्रशासनिक कार्यालय में अटैच करने और न्यायिक जांच की मांग :

आंदोलनरत नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने शासन के समक्ष स्पष्ट शर्त रखी है कि इस गंभीर विफलता के बाद पुलिस अधीक्षक का किसी अन्य जिले में सामान्य स्थानांतरण करना समस्या का समाधान नहीं होगा। मांग की जा रही है कि उन्हें तुरंत प्रभाव से जिले की कमान से मुक्त कर राज्य प्रशासनिक मुख्यालय या किसी गैर-संवेदनशील प्रशासनिक कार्यालय में अटैच किया जाये, ताकि वे जांच प्रक्रिया को किसी भी प्रकार से प्रभावित न कर सकें।

नागरिक संगठनों का तर्क है कि मासूम बालिका के साथ घटी यह बर्बरता केवल एक साधारण आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह समूचे प्रशासनिक तंत्र के पतन का स्पष्ट प्रमाण है। इसलिये पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, पारदर्शी और उच्चस्तरीय न्यायिक निगरानी में सूक्ष्म जांच होनी चाहिये। अब संपूर्ण क्षेत्रवासियों की निगाहें प्रदेश की राज्य सरकार और गृह विभाग के आगामी फैसलों पर टिकी हैं कि वे इस अभूतपूर्व जनआक्रोश, कानून-व्यवस्था की गिरती स्थिति और जिले के प्रशासनिक नेतृत्व को बदले जाने की मांग पर क्या ठोस कार्यवाही सुनिश्चित करते हैं।