प्रशांत महासागर में अल-नीनो का अप्रत्याशित उपद्रव, Nino 3.4 क्षेत्र में तापमान ने तोड़े पुराने रिकॉर्ड, भारत सहित विश्व पर पड़ेगा बड़ा असर।

नई दिल्ली : प्रशांत महासागर के अत्यंत संवेदनशील ‘निनो 3.4’ (Nino 3.4) क्षेत्र में समुद्र की सतह का औसत तापमान सामान्य से 3.05 डिग्री सेल्सियस (3.047°C) ऊपर पहुंच गया है। वर्ष 1991 से 2020 के औसत की तुलना में यह अब तक दर्ज किया गया सबसे ऊंचा दैनिक तापमान विचलन है, जिसने विश्व भर के जलवायु वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों की चिंता बढ़ा दी है।

समय से पहले दर्ज हुई भीषण तेजी :

इससे पहले का उच्चतम रिकॉर्ड नवंबर 2015 में लगभग 3.02 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। इस बार यह चरम स्थिति सामान्य समय से दो महीने पहले, यानी सितंबर माह में ही सामने आ गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अल-नीनो अभी लगातार ऊर्जा संचित कर रहा है और इसके आगामी दिसंबर तक अपने चरम स्तर पर पहुंचने की प्रबल संभावना है। अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु परिघटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी और मध्य भाग की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण और वर्षा चक्र में भारी उथल-पुथल मच जाती है।

वैश्विक स्तर पर संभावित प्रभाव :

  • अमेरिका और दक्षिण अमेरिका: उत्तरी अमेरिका में असामान्य गर्मी तथा पश्चिमी-मध्य हिस्सों में भारी बर्फबारी की आशंका है। वहीं दक्षिण अमेरिका के पेरू और चिली जैसे देशों में अप्रत्याशित अतिवृष्टि और बाढ़ के संकट की शुरुआत हो चुकी है।
  • एशिया और प्रशांत द्वीप: भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों में मानसून की सक्रियता कमजोर पड़ सकती है। इसके अलावा इंडोनेशिया के जंगलों में आग लगने तथा ऑस्ट्रेलिया में सूखे की स्थिति और अधिक गंभीर होने का खतरा है।
  • मध्य अमेरिका व कैरेबियन: लंबे सूखे के कारण कृषि चक्र बाधित होने और मुख्य फसलों को भारी क्षति पहुंचने की आशंका है।

सतर्कता और प्रशासनिक कार्यवाही :

रिकॉर्ड तोड़ तापमान के चलते वैश्विक स्तर पर बाढ़, भीषण सूखा, प्रचंड लू और तूफानों का जोखिम कई गुना बढ़ गया है। विभिन्न देशों के राष्ट्रीय मौसम विज्ञान विभाग तथा आपदा प्रबंधन प्राधिकरण लगातार स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। किसानों और आम नागरिकों को पहले से ही सचेत किया जा रहा है ताकि जल संरक्षण, फसल सुरक्षा और आपातकालीन राहत की अग्रिम कार्यवाही समय रहते सुनिश्चित की जा सके। समय पर की गई ठोस प्रशासनिक कार्यवाही ही इस चरम मौसमी संकट के दुष्प्रभावों को सीमित कर सकती है।