धर्म/संस्कृति : त्यौहारी उल्लास और श्रद्धा के पावन वातावरण में 19 अक्टूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि का नौवां और अंतिम दिन पूरे देश में आस्थापूर्वक मनाया जायेगा। इस पावन अवसर पर जगतजननी आदिशक्ति दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की विधिवत पूजा-अर्चना की जायेगी। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व—ये कुल आठ परम सिद्धियां हैं, जो मां सिद्धिदात्री की अनन्य भक्ति और पूजा से सहजता से प्राप्त की जा सकती हैं। देवी पुराण के पावन प्रसंगों के अनुसार, भगवान शिव ने भी समस्त अलौकिक सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की असीम अनुकंपा से ही प्राप्त की थीं और इन्हीं की अहैतुकी कृपा से महादेव का आधा स्वरूप देवी का हुआ, जिससे वे संसार में ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से प्रख्यात हुए। आध्यात्मिक साधकों और गृहस्थों के लिये समस्त मनोवांछित सिद्धियों और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति के लिये महानवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना सर्वोपरि फलदायी मानी गई है।
महानवमी पूजा का शुभ समय और पंचांग गणना :
पंचांगीय गणना के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का शुभारंभ 19 अक्टूबर 2026 (सोमवार) को प्रातः 10 बजकर 51 मिनट पर होगा। इस पावन तिथि का विस्तार 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार) को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। शास्त्रसम्मत मान्यताओं के अनुसार महानवमी की मुख्य पूजा इसी समयावधि के भीतर संपन्न की जायेगी।
विभिन्न धार्मिक शक्तिपीठों और पूजा पंडालों में दर्शन के लिये श्रद्धालुओं की लंबी लाईनें लगने की संभावना है। दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिये मंदिरों में ऑनलाईन दर्शन तथा विशेष प्रबंध सुनिश्चित किये गये हैं, ताकि सुरक्षा व्यवस्था ठप्प न हो और दर्शन सुगमता से संपन्न हों।
19 अक्टूबर 2026 के प्रमुख शुभ मुहूर्त :
महानवमी पर जप, तप, अनुष्ठान और साधना के लिये शास्त्रसम्मत समय सारिणी इस प्रकार रहेगी:
- ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:43 बजे से प्रातः 05:34 बजे तक (साधना, मंत्र जाप और ध्यान के लिये सर्वोत्तम काल)
- प्रातः संध्या: प्रातः 05:09 बजे से प्रातः 06:24 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:43 बजे से दोपहर 12:29 बजे तक (किसी भी नए व मांगलिक कार्य की शुरुआत के लिये शुभ)
- गोधूलि मुहूर्त: सायं 05:48 बजे से सायं 06:13 बजे तक (संध्या पूजन और महाआरती के लिये श्रेष्ठ)
- सायाह्न संध्या: सायं 05:48 बजे से सायं 07:03 बजे तक
महानवमी पर कन्या पूजन और हवन का महात्म्य
शारदीय नवरात्रि में नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन (कुमारी पूजन) का विशेष विधान है। जो श्रद्धालु नवमी के दिन नौ कन्याओं को जिमाते हैं, वे नवमी तिथि के प्रारंभ होने के बाद कन्या पूजन का अनुष्ठान कर सकते हैं।
- कन्याओं का देवतुल्य वरण: धर्मग्रंथों के अनुसार 2 से 10 वर्ष की नौ बालिकाओं को नवदुर्गा का साक्षात स्वरूप और एक बालक को बटुक भैरव मानकर आमंत्रित किया जाता है।
- पाद प्रक्षालन व तिलक: कन्याओं के चरण स्वच्छ जल अथवा दूध से धोकर उन्हें उच्च आसन पर आदरपूर्वक बिठाया जाता है। इसके पश्चात उनके मस्तक पर अक्षत, कुमकुम का तिलक लगाकर हाथ में रक्षासूत्र बांधा जाता है।
- महाप्रसाद अर्पण: मां सिद्धिदात्री के सिद्ध नैवेद्य—हलवा, पूड़ी, काले चने और खीर—का भोग कन्याओं को अत्यंत श्रद्धापूर्वक कराया जाता है।
- आशीर्वाद ग्रहण: भोजनोपरांत बालिकाओं को फल, मिष्ठान्न, सुहाग-श्रृंगार सामग्री और सामर्थ्यानुसार दक्षिणा भेंट कर उनके चरण स्पर्श किये जाते हैं। भक्तजन यह संकल्प लें कि वे समाज में कन्याओं के सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी निष्ठापूर्वक निभायें, तभी देवी पूजन का वास्तविक फल प्राप्त होता है।
मां सिद्धिदात्री की प्रिय पूजन सामग्री, प्रिय रंग और भोग
साधकों की सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिये नवमी के दिन देवी को विशेष वस्तुएं अर्पित की जाती हैं:
- प्रिय महाभोग: मां सिद्धिदात्री को खीर, पूड़ी, काले चने, हलवा, नारियल और ऋतुफल का भोग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि यह सात्विक नैवेद्य अर्पित करने से परिवार के सभी कष्ट दूर होते हैं और आर्थिक तंगी का निवारण होता है।
- पुष्प अर्पण: भगवती सिद्धिदात्री को चंपा, कमल अथवा गुड़हल के पुष्प अर्पित करने चाहिये। इन सुगंधित व दिव्य पुष्पों के अर्पण से घर में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचरण होता है।
- गुलाबी वर्ण का विशेष महत्व: मां सिद्धिदात्री की उपासना में गुलाबी रंग को अत्यंत मंगलकारी और शुभ माना गया है। गुलाबी वर्ण निर्मल प्रेम, करुणा और नारीत्व की सौम्यता का प्रतीक है। अतः संभव हो तो साधक गुलाबी रंग के वस्त्र धारण कर उपासना में बैठें और मां भगवती को लाल अथवा गुलाबी रंग की जरीदार चुनरी अर्पित करें।
- सौभाग्य द्रव्य: सुहागिन महिलाओं को मां सिद्धिदात्री के चरणों में सिंदूर, बिंदी, आलता, चूड़ियां, मेंहदी व संपूर्ण सुहाग पिटारी जरूर चढ़ानी चाहिये, जिससे अखंड सौभाग्यवती होने का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त होता है।
शारदीय नवरात्रि का पारण: 20 अक्टूबर को व्रत खोलने का विधान
शारदीय नवरात्रि के नौ दिवसीय अनुष्ठान का विधिवत पारण 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को किया जायेगा। जिन श्रद्धालुओं ने प्रतिपदा से नवमी पर्यंत उपवास रखा था, वे इस दिन अपना व्रत खोल सकते हैं।
व्रत खोलने से पहले साधक प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर मां भगवती की अंतिम षोडशोपचार पूजा संपन्न करें। हवन कुंड में दुर्गा सप्तशती के निर्वाण मंत्र अथवा संपुट मंत्रों से पूर्णाहूति दी जायेगी। तत्पश्चात माता रानी को अंतिम भोग लगाकर आरती की जायेगी और प्रसाद का वितरण किया जायेगा। अंत में भगवती का चरणामृत और सात्विक महाप्रसाद ग्रहण करके ही व्रत का पारण किया जायेगा, जिससे नौ दिनों की तपस्या निर्विघ्न रूप से फलीभूत होती है।



