आरक्षण की वर्तमान दिशा : मूल उद्देश्य से भटकाव, राजनीतिकरण और एक जरूरी विचार – विमर्श, राष्ट्र को गर्त में धकेलता आरक्षण।

विशेष लेख : बिहार के हालिया जातिगत गणना के आंकड़ों के बाद आरक्षण का दायरा बढ़ाने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। आज आरक्षण पर हो रही बयानबाजी को देखकर स्पष्ट होता है कि इस नीति के मूल उद्देश्यों पर अब कोई तार्किक विमर्श नहीं बचा है। जब संविधान निर्माताओं, विशेषकर डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था, तो उनका लक्ष्य एक सीमित अवधि (10 वर्ष) में समाज को समान स्तर पर लाना था। वे कुछ वर्गों को स्थायी विशेषाधिकार देने के पक्षधर नहीं थे। लेकिन सात दशक बाद भी यह व्यवस्था न केवल जारी है, बल्कि नए-नए समूहों तक इसका विस्तार होता जा रहा है।

इस पूरे परिदृश्य को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है :

समीक्षा का अभाव और सत्ता की राजनीति :

यह सबसे आश्चर्यजनक तथ्य है कि पिछले 70 वर्षों में आरक्षण के वास्तविक परिणामों का किसी भी स्तर पर कोई प्रामाणिक अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं किया गया। बिना किसी प्रभाव-आकलन के इस नीति का विस्तार यह साबित करता है कि आरक्षण अब सामाजिक न्याय का साधन नहीं, बल्कि संसाधनों और पदों पर कब्जे का राजनीतिक हथियार बन चुका है। सत्ता और दलीय प्रतिस्पर्धा के लालच में राजनीतिक दल गुणवत्ता की चिंता छोड़ चुके हैं। न्यायपालिका जब भी इसमें सुधार का प्रयास करती है, तो संविधान संशोधन के जरिए उसे पलट दिया जाता है।

योग्यता की अनदेखी और बढ़ता सामाजिक टकराव :

आज स्थिति यह है कि कला, संस्कृति और यहां तक कि खेल-कूद में भी आरक्षण की मांग उठने लगी है। जिस तरह आज कई विधायक, प्रोफेसर या संस्थानों के प्रमुख योग्यता के बजाय आरक्षण से तय हो रहे हैं, वही हाल अगर खिलाड़ियों और वैज्ञानिकों का हुआ, तो देश की कार्यक्षमता पूरी तरह चरमरा जाएगी। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने ठीक ही रेखांकित किया था कि इतने वर्षों बाद भी आरक्षण जारी रखकर हम केवल सामाजिक वैमनस्य बढ़ा रहे हैं। यह कोई न्याय-दर्शन नहीं है कि ‘पूर्वजों के कथित जुर्मों’ की सजा आज की योग्य पीढ़ी को दी जाए, वह भी तब जब इन ऐतिहासिक मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ है।

असली विषमता और दोहरे मापदंड :

हमारे नीति-निर्माताओं ने कभी प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता या मातृभाषा में अच्छी शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई गंभीरता नहीं दिखाई। आज देश में सबसे बड़ा भेदभाव ‘अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व’ है, जो असंख्य प्रतिभाओं को पीछे धकेल देता है। दूसरी ओर, वोट बैंक की राजनीति के कारण ईसाई और मुस्लिम जैसे समुदायों को भी जातिगत आरक्षण दिया जा रहा है, जबकि उनके धर्मों में जाति-व्यवस्था का कोई सैद्धांतिक आधार ही नहीं है। यह दोहरापन राजनीतिक लोभ का स्पष्ट प्रमाण है।

वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के प्रमुख दुष्प्रभाव

  • प्रतिभा पलायन (Brain Drain): सामान्य वर्ग के मेधावी युवा देश में अवसर न मिलने के कारण विदेशों का रुख कर रहे हैं, जहां वे बिना किसी आरक्षण के अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं।
  • सामाजिक कटुता: यह नीति समाज में जातियों के बीच आपसी द्वेष, असंतोष और तनाव बढ़ा रही है, जिससे राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता प्रभावित होती है।
  • क्रीमी लेयर का एकाधिकार: आरक्षित वर्गों के भीतर ही एक संपन्न तबका सारे लाभ उठा रहा है, जबकि उसी वर्ग का सबसे गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति आज भी सुविधाओं से वंचित है।
  • जातिवाद का सुदृढ़ीकरण: जाति विहीन समाज बनाने के बजाय, यह व्यवस्था समाज में जातिगत पहचान और अलगाववाद को और अधिक गहराई से स्थापित कर रही है।

सकारात्मक विकल्प और आगे की राह आरक्षण को अनंत काल तक जारी रखने के बजाय इसे समय-सीमा में बांधना आवश्यक है। दुर्बलों के उत्थान के लिए जातिगत कोटे के बजाय ‘समान अवसर’ वाले वास्तविक विकल्प अपनाए जाने चाहिए। सरकार को प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, कुपोषण ग्रस्त बच्चों को विशेष आहार देने, और गरीब परिवारों को मुफ्त अध्ययन-प्रशिक्षण व आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

समाधान : ‘बैसाखी’ की जगह वास्तविक सशक्तिकरण अब समय आ गया है कि आरक्षण को एक निश्चित समय-सीमा में बांधकर, वंचित वर्गों की सहायता के लिए वैकल्पिक और सकारात्मक उपाय किए जाएं:

  • बुनियादी सुविधाएं: कुपोषण दूर करने के लिए विशेष भोजन, और अध्ययन के लिए मुफ्त व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए।
  • आर्थिक सहायता: जो परिवार बच्चों को पढ़ाने में अक्षम हैं, उन्हें सीधे आर्थिक मदद मिले ताकि बच्चों को मजदूरी न करनी पड़े।
  • अंतिम चयन में योग्यता: जब नौकरी, परीक्षण या प्रतियोगिता का समय आए, तो पैमाना केवल और केवल ‘योग्यता’ होना चाहिए।

निष्कर्ष : आज कोई यह नहीं कह सकता कि आरक्षित वर्गों की स्थिति सात दशक पहले जैसी है। आज वे सर्वोच्च पदों और राष्ट्रीय निकायों में मौजूद हैं। भारत के युवा, चाहे वे कितने भी गरीब या किसी भी पृष्ठभूमि के हों, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में बिना किसी आरक्षण के अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। ऐसे में देश के भीतर उन्हें स्थायी रूप से ‘बैसाखी’ देना अंततः सभी समुदायों और पूरे राष्ट्र की हानि है। देश की सभी प्रतिभाओं को अपना मानकर योग्यता का सम्मान करना ही भारत को विश्व पटल पर मजबूत बनाएगा।