रायपुर : विवाह के पूर्व दंपत्ति को थैलेसीमिया की जाँच आवश्यक रूप से करवाना चाहिये। जब बच्चों का विकास अवरुद्ध होने लगे, वह उम्र से काफी छोटा नजर आए तो यह थैलेसीमिया के कारण हो सकता है। इस बीमारी में सूखता चेहरा, कमजोरी, सांस लेने में तकलीफ, वजन न बढ़ना आदि लक्षण भी सामने आते हैं। थैलेसीमिया विरासत में मिली खून की बीमारी है। बच्चों को उनके माता-पिता से ही यह बीमारी मिलती है। इसलिए विवाह से पूर्व युवक-युवती के खून की जांच अवश्य करानी चाहिए।
पीड़ित व्यक्ति को तरह-तरह की शारीरिक परेशानियाें का सामना करना पड़ता है :
थैलेसीमिया पीड़ित व्यक्ति का शरीर कम हेल्दी हीमोग्लोबिन प्रोटीन का उत्पादन करता है। अस्थि मज्जा भी कम रेड ब्लड सेल्स का उत्पादन करती है। रेड ब्लड सेल्स कम हो जाने को एनीमिया कहा जाता है। शरीर के टिश्यूज तक आक्सीजन पहुंचाने में रेड ब्लड सेल्स की अहम भूमिका होती है, लिहाजा पीड़ित व्यक्ति को तरह-तरह की शारीरिक परेशानियाें का सामना करना पड़ता है। थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थैलेसीमिया होता है तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया हो सकता है जो काफी घातक होता है। किन्तु माता-पिता में से एक ही में माइनर थैलेसीमिया होने पर बच्चे को खतरा नहीं होता।
विवाह से पूर्व खून की जांच इसलिए आवश्यक है :
विवाह से पूर्व खून की जांच इसलिए आवश्यक है कि युवक-युवती पहले से इससे पीड़ित तो नहीं हैं। इसी तरह गर्भावस्था के पूर्व भी थैलेसीमिया की जांच करानी चाहिए। गर्भस्थ शिशु में इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। यदि माता-पिता माइनर थैलेसीमिया से पीड़ित हैं तो बच्चे मेजर थैलेसीमिया से पीड़ित हो सकते हैं। यह स्थिति काफी घातक होती है। थैलेसीमिया के कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती हैं। रक्त की कमी के कारण मरीज को बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। उसके ह्दय, लिवर व फेफड़ों को भी नुकसान पहुंचता है।
थैलेसीमिया का उपचार :
थैलेसीमिया का इलाज रोग की गंभीरता, मरीज को हो रही स्वास्थ्य समस्याएं और अन्य लक्षणों के अनुसार किया जाता है। थैलेसीमिया के इलाज में प्रमुख रूप से निम्न ट्रीटमेंट शामिल हैं –
1. इसमें मरीज को हर दो से तीन हफ्तों में खून चढ़ाना पड़ता है, जिससे उसके शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को कम होने से रोका जाता है। हालांकि, बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन का स्तर बढ़ जाता है, जिसे आयरन ओवरलोड कहा जाता है। आयरन बढ़ने से शरीर के अंदरूनी अंग क्षतिग्रस्त होने लग जाते हैं, जिनमें हृदय व लीवर भी शामिल हैं। इस स्थिति का इलाज करने के लिए मरीज को विशेष दवाएं दी जाती हैं, जिनकी मदद से अतिरिक्त आयरन को पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
2. इसके अलावा मरीज को स्वास्थ्यकर आहार व अन्य सप्लीमेंट (जैसे फोलिक एसिड) आदि भी दिए जाते हैं, ताकि शरीर को स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद मिले।
3. थैलेसीमिया के लिये बोन मैरो या हेमेटोपोएटिक सेल ट्रांसप्लांट की भी संभावनाएं हैं। बोन मैरो या हेमेटोपोएटिक सेल ट्रांसप्लांट में बोन मैरो में थैलेसीमिया पैदा करने वाली कोशिकाओं को मिटाने के लिए हाई कीमोथेरेपी दिया जाता है, इनमें फिर डोनर से लिया गया स्वस्थ सेल्स को प्रतिस्थापित किया जाता है। डोनर वह व्यक्ति है जिसका ह्यूमन -ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) रोगी के साथ मेल खाता है, आमतौर पर अपने भाई-बहन।
रोगी जितना युवा होगा इसका परिणाम उतना हीं अच्छा होगा। इसके अलावा इस रोग के रोगियों के अस्थि मज्जा (बोन मैरो) ट्रांस्प्लांट हेतु अब भारत में भी बोनमैरो डोनर रजिस्ट्री खुल गई है। थैलेसीमिया से पूरी तरह से निपटने के लिए, विशेषज्ञों की सलाह और उनके द्वारा बताए गए उपायों का पालन करना आवश्यक होता है। इस बीमारी के खिलाफ लड़ने के लिए हमें समुदाय के साथ मिलकर काम करना होगा।