छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत चुनाव को लेकर गहमा गहमी, सुलगते सवाल।

रायपुर : सबसे पहले तो यह समझना जरुरी है की समाज क्या होता है ? उसका जवाब है समाज एक से अधिक लोगों के आपसी जुड़ाव और सामंजस्य से मिलकर बने एक वृहद समूह को कहते हैं जिसमें सभी व्यक्ति मानवीय कार्य कर एक दूसरे सहयोग करते हैं। मानवीय क्रियाकलाप में आचरण, सामाजिक सुरक्षा और निर्वाह आदि की क्रियाएं सम्मिलित होती हैं। समाज लोगों का ऐसा समूह होता है जो अपने अंदर के लोगों के मुकाबले अन्य समूहों से काफी कम मेलजोल रखता है। ऐसी स्थिति में समाज को एकजूट करना और उनके उत्थान को लेकर कार्य करने के लिये समाज के समूह से जागरूक लोग मिलकर संस्थाओं का गठन करते है, और वहीँ संस्थायें समाज के उत्थान के लिये कार्य अथवा नेतृत्व करते है।

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रायपुर में सिन्धी समाज की 100 से ज्यादा संस्थायें है, जो सिन्धी समाज के साथ ही अन्य समाजों के लिये अपने कार्य भी करती है, सभी संस्थायें अपने स्तर, आवश्यकता और सामर्थ्य के अनुसार कार्य भी करती है। वहीँ कई संस्थाओं के कार्य सिर्फ नाम के स्तर पर होते है, उन पर ही सवाल उठते है, लेकिन सवाल उठाना उचित है अथवा नहीं, यह तय करना जनता का काम है।

छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत” में लम्बे समय बाद हो रहा है चुनाव :

छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत के मुखिया के तौर पर पूर्व विधायक और चैम्बर अध्यक्ष श्रीचंद सुन्दरानी को ही मुख्यतौर पर जाना जाता है। आज अचानक से इतने लम्बे समय के बाद इस संस्था को चुनाव करवाने की जरूरत क्यूँ पड़ी? आज जब चुनाव करवाने की जरूरत पड़ी तो पहले चुनाव क्यूँ नहीं करवाये गये? बताया जाता है कि इस संस्था को छत्तीसगढ़ की लगभग 70 सिन्धी पंचायतों का समर्थन प्राप्त है, तो क्या उन पंचायतों के अध्यक्ष का चुनाव संवैधानिक तरीके से हुआ है अथवा नहीं? क्या सभी पंचायतें क़ानूनी तौर पर पंजीकृत है अथवा नहीं? वहीँ इस मुद्दे पर बहुत से सवाल उठ रहे है, जो कि समाज का आम नागरिक जानना चाहता है। वहीँ सामान्य चुनाव को हाईप्रोफाईल बना दिया गया है। वहीँ आपसी सहमति से समाज की एकता को दिखाते हुये प्रत्याशी एक दूसरे के विरुद्ध खड़े नहीं होते।

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जैसा की नाम से समझ में आता है कि छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत छत्तीसगढ़ के सिन्धी समाज की प्रमुख संस्था है तो यह संस्था कितने वर्षों से कार्य कर रही है? जवाब होगा काफी वर्षों से कार्य कर रही है, तो फिर सवाल उठता है कि काफी वर्षों से अगर संस्था कार्य कर रही है तो इसका खर्च कौन उठा रहा है? अगर कोई इसका खर्च उठा रहा है तो समाज के सामने क्या कभी इस खर्च को समाज अन्य प्रतिनिधियों के सामने बताया गया है? जिससे अन्य संस्थायें भी समाज हित के लिये इस संस्था को जरुरी फंड मुहैया करवा सकें? या फिर यह संस्था अपनी मनमर्जी से चल रही है? क्या संस्था का पंजीयन है? अगर है तो क्या उसका ऑडिट प्रतिवर्ष करवाया जाता है? संस्था के वैधानिक तौर पर कितने स्थायी और अस्थायी सदस्य है? ऐसे ही कई क़ानूनी और वैधानिक सवालों के घेरे में यह संस्था है, जिससे सिन्धी समाज का युवा मुखातिब होना चाहता है।

सालों की इस संस्था की क्या है उपलब्धियां :

समाजिक और सांस्कृतिक त्यौहार मनाना संस्था के सामाजिक दायित्व में नहीं आता, समाज के लिये जरुरी है स्कूल, कॉलेज, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार , सामाजिक भवन आदि। जबकि अन्य कई छोटी-छोटी संस्थाओं ने इनमें से कुछ कार्यों की पूर्ति की है, जिसका लाभ समाज के लोगों को मिल रहा है। तो इतने सालों से छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत ने ऐसा कोई महत्वपूर्ण कार्य किया है जिसका लाभ सिन्धी समाज के लोगों को मिला हो? अगर नहीं तो ऐसी संस्था क्यूँ बनाई गई है? वहीँ इस संस्था ने कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों वृहद आयोजन किया है, तो वह फंड कहाँ से आया? कितना आया और कहाँ गया? क्या कभी इसका लेखा-जोखा समाज के सामने रखा गया है अथवा पंजीयन अधिकारी के सामने ऑडिट करवाई गई है? यदि इतनी पुरानी संस्था की कोई उपलब्धी हो तो समाज के युवा जानना चाहते है, अन्यथा ऐसी संस्थायें समाज के युवाओं को क्या दिशा दे रही है?

दबाव में हो रहा है चुनाव :

छत्तीसगढ़ सिन्धी पंचायत में आज तक चुनाव नहीं हुआ है और एकतरफा इस संस्था का संचालन किया गया है, जिसको लेकर इस बार युवाओं ने दबाव बनाया और पंचायत के संचालकों को चुनाव करवाने के लिये मजबूर होना पड़ा। वहीँ जानकारी के अनुसार इस संस्था में लगभग 600 सदस्यों की संख्या है। इतनी पुरानी संस्था में 600 सदस्य होने के बावजूद समाज के लिये आज तक कोई भवन नहीं बनाया जा सका, कोई मंदिर नहीं बनाया जा सका,अथवा कोई अदना सा सामाजिक कार्य जिससे समाज के लोगों का भला हो नहीं कर पाये इतने सालों में, तो आख़िरकार युवाओं को अपनी आवाज बुलंद करके इनके संचालकों से चुनाव के करवाने के लिये दबाव बनाना पड़ा। बातें तो बहुत है, लेकिन बस इतने सवाल युवाओं ने इन समाज के मुखियाओं के सामने रखे है। अब जनता का काम है सही को जीताना।

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वहीँ एक आखरी सवाल आता है, छत्तीसगढ़ के स्तर पर प्रमुख संस्था के मुखिया पूर्व विधायक भी रह चुके है, समाज के लोग कहते है हमने तो उन्हें समाज का हित करेंगे सोचकर जिताने में जी जान लगा दिया था, फिर उनके जीतने के बाद समाज के लोगों को कहा गया यह मेरा क्षेत्र नहीं है, आप अपनी समस्या कहीं और लेकर जाओ, ना 5 साल के विधायक रहते उन्होंने समाज का भला किया और ना ही संस्थागत तौर पर, चैम्बर से भी सिन्धी प्रत्याशी हटवाने का पूरा इंतजाम कर दिया था, इसी कारण दूसरे गुट का व्यक्ति मुखिया बना। ये सब किया था दुबारा विधायक टिकट मिल जाये, वह भी गई और सामाजिक दबदबे से भी बाहर हो गये। अब मजबूरन पंचायत का चुनाव करवाना पड़ रहा है।

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