औरंगाबाद (महाराष्ट्र) : हिन्दू संस्कृति में तलाक की कोई परिकल्पना नहीं है, यह उर्दू शब्द है, ऐसे में इसकी जगह हिंदी में सम्बन्ध विच्छेद शब्द का प्रयोग किया जा सकता है, यह बात कहने का अर्थ है कि हिन्दू संस्कृति में तलाक की बात कहीं नहीं आती है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में विवाहित जोड़े अलग रहना चाहते है तो उन्हें अपना सम्बन्ध खत्म करना होता है, ऐसे में अब ये मामले लगातार बढ़ रहे है। वहीँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद की एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया है कि तलाक के बाद माता-पिता अपने बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र से पूर्व साथी का नाम नहीं हटवा सकते हैं। ऐसे में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें मांग की गई थी कि बच्चे के जन्म रिकॉर्ड में केवल उसका नाम माता-पिता के रूप में दर्ज किया जाए। कोर्ट ने कहा “वैवाहिक विवादों में उलझे माता-पिता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।”
ऐसे में हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति मंगेश पाटिल और वाई जी खोबरागड़े ने 28 मार्च को दिए आदेश में ऐसी याचिकाओं की निंदा करते हुए कहा कि माता-पिता में से कोई भी अपने बच्चे के जन्म रिकॉर्ड के संबंध में किसी भी अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता। इस तरह से महिला को कोर्ट से बड़ा झटका लगा है।
महिला पर 5000 का जुर्माना लगाया :
हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका इस बात का एक सटीक उदाहरण है कि कैसे वैवाहिक विवाद कई मुकद्द्मों का कारण बनता है और याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया है, यह देखते हुए कि याचिका प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग और अदालत के कीमती समय की बर्बादी है। 38 वर्षीय महिला ने याचिका दायर कर औरंगाबाद नगर निगम अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि वे उसके बच्चे के जन्म रिकॉर्ड में उसका नाम एकल अभिभावक के रूप में दर्ज करें और केवल उसके नाम से जन्म प्रमाण पत्र जारी करें। जो कि ऐसा नहीं हुआ।
बच्चे के जन्म रिकॉर्ड से छेड़छाड़ का अधिकार नहीं :
महिला ने अपनी याचिका में दावा किया कि उसका पति कुछ बुरी आदतों का आदी है और उसने कभी अपने बच्चे का चेहरा भी नहीं देखा है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि बच्चे का पिता बुरी आदतों का आदी है, मां बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में एकल अभिभावक के रूप में उल्लेख किए जाने के अधिकार पर ज़ोर नहीं दे सकती। इसमें कहा गया है कि “माता-पिता में से कोई भी बच्चे के जन्म रिकॉर्ड के संबंध में किसी भी अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता है।” वहीँ बार-बार दस्त्वावेजी सुधारों से परेशानी भी उठानी पड़ती है।
हाईकोर्ट ने कहा – यह समय की बर्बादी :
उच्च न्यायालय ने कहा कि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि महिला अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए बच्चे के हितों की भी परवाह नहीं करती है, न्यायालय ने कहा कि बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है। पीठ ने आदेश में कहा, “जिस राहत का दावा किया जा रहा है, वह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वह अपने बच्चे के साथ इस हद तक व्यवहार कर सकती है, जैसे कि वह एक संपत्ति है। वह बच्चे के हित और कल्याण की अनदेखी करते हुए उसके संबंध में वह कुछ अधिकारों का दावा कर सकती है।” कोर्ट ने कहा कि महिला ने जन्म रिकॉर्ड में केवल अपना नाम दर्ज करने की मांग करके बच्चे के हित को कमजोर किया है। याचिका को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि उसे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह “प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग और अदालत के कीमती समय की बर्बादी” है। आपको बात दें कि सरकारी दस्तावेजों में बार – बार सुधार करवा पाना संभव नहीं है और बार-बार बदलाव करवाना भी टेढ़ी खीर है।



