रायपुर : हर दवाई के एक ही फ़ॉर्मूले पर कई कम्पनियाँ दवाइयां बनाती है, जो जेनेरिक दवाइयों की अपेक्षा 9 गुणा तक महँगी होती है, वहीँ नीजी अस्पताल कंपनियों की आड़ में मरीज पर उसी कम्पनी की दवाइयां खरीदने का दबाव डालते है जो उनके अस्पताल के मेडिकल से बेचीं जाती है। ऐसे में निजी अस्पतालों में मरीजों पर अस्पताल की ही दवा दुकान से दवा खरीदने का दबाव बनाने की शिकायतों के बीच अब राहत की खबर सामने आई है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने प्रदेश के सभी निजी अस्पतालों में सूचना बोर्ड को आवश्यक रूप से लगाने के निर्देश जारी किए हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा होगा कि मरीज किसी भी अधिकृत दवा दुकान से दवा खरीद सकता है और अस्पताल की फार्मेसी से दवा लेना अनिवार्य नहीं होगा।
यह मांग रायपुर के वासुदेव जोतवानी द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के समक्ष उठाई गई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा था कि कई निजी अस्पताल मरीजों और उनके परिजनों पर दबाव बनाकर वहीं से दवा लेने को मजबूर करते हैं। बाहर से दवा लाने पर इलाज की जिम्मेदारी न लेने जैसी बातें कही जाती थीं, जिससे गरीब मरीज मानसिक दबाव में आ जाते थे। गरीब मरीज मजबूरीवश उन दवाइयों को खरीदते थे।
इस मामले में वासुदेव जोतवानी का कहना है कि निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में दवाएं महंगे दामों पर बेची जाती हैं, जहां न तो छूट मिलती है और न ही कम दाम वाली या सामान्य दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। इससे मरीजों पर 100 से 150 प्रतिशत तक अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन नियंत्रक कार्यालय ने सभी औषधि निरीक्षकों और सहायक औषधि नियंत्रकों को आदेश दिया है कि निजी अस्पतालों में अनिवार्य रूप से यह बोर्ड लगाया जाए।
गौरतलब है कि निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजनों पर अस्पताल के फार्मेसी से ही दवा खरीदने का दबाव बनाया जाता था, जिससे अस्पताल को लाभ मिल सके। वहीं इन दुकानों की दवाओं में किसी तरह की छूट नहीं होने और दवाएं बाजार से महंगी होने के कारण गरीब मरीजों को परेशानी का समाना करना पड़ता था। ऐसे में शासन के इस फैसले से मरीजों को काफी राहत मिलेगी। इलाज करवाने वाला गरीब मरीज भी नीजी अस्पतालों में इलाज करवाने के लिये मजबूर होता है, ऐसे में उनके लिये ये राहत वाली बात है।



