विक्रम साहू और यश विश्वकर्मा चिलम, लाइटर, सिगरेट, गोगो पेपर और हाइड्रोपोनिक गांजे सहित गिरफ्तार।

दुर्ग/भिलाई : राज्य में विभिन्न प्रकार के नशे करोड़ों रूपये की रकम के बिक रहे है, वहीँ अब गांजे की नई किस्म का मामला भी सामने आया है, जहाँ छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पुलिस ने 2 युवकों को सामान्य गांजा और हाइड्रोपोनिक गांजे के साथ गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि, ये दोनों युवक हाई-टेक तरीके से हाइड्रोपोनिक गांजा उगा कर बेच रहे थे। इसकी सूचना मिलने के बाद पुलिस ने छापा मारकर दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। छापे के दौरान पुलिस को मौके से 40 हजार रुपए नकद, एक महंगा मोबाईल फोन, चिलम, लाईटर, सिगरेट और गोगो पेपर भी मिला ही, ये सभी सामान काफी मात्रा में मिले है। जब्त किए गए कुल सामान की कीमत लगभग 1 लाख 75 हजार रुपए बताई जा रही है।

इस मामले में मिली जानकारी के अनुसार भिलाई नगर पुलिस को सूचना मिली थी कि रुआबांधा क्षेत्र में बीज विकास निगम के पास कुछ युवक नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री कर रहे हैं। इसकी सूचना के आधार पर पुलिस ने मौके पर जाकर तुरंत दबिश दी और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इन पकड़े गये आरोपियों की पहचान विक्रम साहू और यश विश्वकर्मा के रूप में हुई है। तलाशी के दौरान पुलिस ने आरोपियों के पास से करीब 2 किलो सामान्य गांजा बरामद किया गया है, जिसकी कीमत लगभग 1 लाख रुपए आंकी गई है। इसके अलावा 2.3 ग्राम हाइड्रोपोनिक गांजा भी जब्त किया गया है, जो छोटे पैकेट्स में रखा हुआ था। यह नये तरीके से उगाया गया गांजा है।

पूछताछ में कबूला जुर्म :

वहीँ इस मामले की पूछताछ में आरोपियों ने बताया है कि वे अधिक मुनाफा कमाने के लालच में इस अवैध कारोबार से जुड़े हुये थे। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की जांच में जुट गई है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि भिलाई में हाइड्रोपोनिक गांजा कहां से लाया जा रहा था और इस गिरोह में और कौन-कौन शामिल हैं। दोनों आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

क्या है हाइड्रोपोनिक गांजा :

हाइड्रोपोनिक गांजा एक आधुनिक तकनीक से उगाया जाता है, जिसमें मिट्टी का उपयोग नहीं होता है बल्कि इसे पानी और विशेष पोषक तत्वों की मदद से बंद कमरे या लैब जैसे वातावरण में तैयार किया जाता है। इसमें पौधों की जड़ों को सीधे खनिज युक्त पानी में रखा जाता है और कोको कॉयर, रॉकवूल या पेर्लाइट जैसे माध्यम केवल सहारा देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इस प्रक्रिया में शक्तिशाली एलईडी या एचपीएस लाइट्स का उपयोग किया जाता है, जो सूर्य की रोशनी की कमी को पूरा करती हैं। साथ ही पानी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम का संतुलित मिश्रण दिया जाता है और एयर पंप के जरिए ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है। कमरों में नियंत्रित माहौल होने से कीट और बीमारियों का खतरा भी कम रहता है। इस प्रक्रिया के जरिये इस गांजे का उत्पादन किया जाता है।