पप्पू कालानी, मुंबई का वो सिन्धी डॉन, जिससे डरते थे दाउद और छोटा राजन भी, रसूख ऐसा कि सिंधियों का मसीहा कहलाता था।

राकेश डेंगवानी/सम्पादकीय : सिन्धी और बनियों का अपराध से दूर – दूर तक कोई नाता नहीं होता, ये समुदाय शांतिप्रिय समुदाय है, जिसे आमतौर पर कमजोरी समझा जाता है। सन 1947 की सबसे अच्छी बात – भारत देश आज़ाद हुआ था और सन 1947 की सबसे बुरी बात – देश का बंटवारा हुआ था, जब देश का बंटवारा हुआ तो लाखों लोग विस्थापित हुए। इन विस्थापितों में से एक तबका सिंधियों का भी था जिन्हें मुंबई के नज़दीक एक ट्रांजिट मिलट्री कैंप में रखा गया था, ये मिलट्री कैंप उल्हास नदी के किनारे था। हर बड़ी सभ्यता के आस पास नदी ज़रूरी होती है, जहाँ आम लोग को जीवन जीने में सुविधा होती थी। यहां पर भी एक सभ्यता अपनी पहली सांसे ले रही थी। ये एक बड़े शहर का जन्म था, जहाँ अपनी नदी के चलते शहर का नाम रखा गया था उल्हासनगर

सिंधी परिवार के वो एक लाख से ज़्यादा लोग जो अपना सब कुछ पाकिस्तान में छोड़ कर चले आए थे, उन लोगों को सब-कुछ शुरू से शुरू करना था, लेकिन उनके खून में ही व्यापार था, सिंधियों के लगातार प्रयासों और कड़ी मेहनत से धीरे-धीरे एक ट्रांजिट कैंप, शरणार्थी शिविर के रास्ते होता हुआ एक समृद्ध शहर बनता चला गया। शहर, जिसे कागज़ों में उल्हासनगर कहा जाता था लेकिन वहां की सबसे बड़ी कम्यूनिटी उसे प्यार से सिंधुनगर कहती थी।

जहां पैसा होता है, वहां पावर भी होती है और होते हैं कुछ लोग जो इस पावर को ‘मैनेज’ करते हैं। इस पावर को मैनेज करने वाले कुछ लोग ‘क़ानूनी’ होते हैं, कुछ लोग ‘ग़ैर क़ानूनी’ होते हैं, लेकिन सबसे कम मात्रा में वो होते हैं जो न पुलिस वाले होते हैं, न गुंडे होते हैं। संख्या में कम ये लोग पावर में सबसे टॉप में होते हैं।


# गोपाल राजवानी –

24 जनवरी, 2000 को उल्हासनगर के शिवसेना नेता गोपाल राजवानी को चार अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दीथी, गोपाल राजवानी शुरू में उल्हासनगर में पापड़ बेचता था, लेकिन जब गोविंद वाचानी नाम के एक गैंगस्टर के संपर्क में आया तो अपराध की दुनिया में उसका नाम तेज़ी से बढ़ने लगा था, वह वहां का नामी डॉन था। बाद में राजवानी, पप्पू कलानी के साथ मिल गया और इनकी ‘शॉर्ट टर्म’ दोस्ती के दौरान ही ब्लिट्ज के उप-संपादक ए वी नारायण की हत्या हुई थी, दोनों को इस हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया लेकिन सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया था।

भारत में खोजी-पत्रकारिता के क्षेत्र में ब्लिट्ज़ अपने आप में मील का पत्थर था, ऐसा साप्ताहिक अख़बार जो सत्ता को हिला देने की ताकत रखता था। अगस्त, 1983 की किसी ‘भरी दुपहरी’ में उल्हासनगर में ब्लिट्ज़ के उप-संपादक ए एन नारायण अपने पड़ोसी रवि शर्मा के साथ विठलवाड़ी स्टेशन पर टहल रहे थे तभी उन्हें पीछे से दो लोगों ने टोका। इन दो लोगों ने रवि शर्मा से वहां से ‘कट’ लेने को कहा था, जब रवि थोड़ी देर बाद वहां लौटे तो उन्होंने नारायण को खून से लथपथ पाया गया। नारायण के शरीर में 25 अलग-अलग जगहों पर चाकू से वार किया गया था।

1985 में राजवानी और कलानी की अनबन हो गई थी, ये अनबन वसूली के पैसों के बंटवारे को लेकर थी। बदले की आग में जलते कलानी ने अप्रैल, 1985 में राजवाणी को गिरफ्तार करवा दिया था और जब पुलिस राजवाणी को रिक्शे में बिठाकर विठलवाड़ी पुलिस स्टेशन ले जा रही थी तो कलानी के गुंडों ने हमला करने का प्लान बनाया था, जिसके बाद राजवानी गंभीर रूप से घायल हो गया था, लेकिन उसकी ज़िंदगी बच गई थी। उसे जे जे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया और वहां वो हाजी मस्तान के संपर्क में आया। हाजी मस्तान ने राजवानी को अपनी शरण में ले लिया और उसे सुरक्षा भी थी। फिर राजवानी दुबई गया और दाऊद इब्राहिम से मिला।

मगर वो फिर कभी उल्हासनगर वापस नहीं आया, वह पप्पू कलानी के डर के चलते नहीं लौटा, जब 1992 में कलानी को टाडा के अंडर में गिरफ्तार कर लिया गया तब जाकर सालों बाद राजवानी की घर (उल्हासनगर) वापसी हुई थी और पप्पू कलानी को राजवानी के दाएं हाथ मारुथी जाधव के मर्डर के चलते गिरफ्तार गिया गया था। बाद में उस पर सात और मर्डर के आरोप तय हुए, जब पप्पू कलानी जेल में था उन दिनों में राजवानी की शक्ति बढ़ती चली गई और राजवानी ने 1995 में शिव सेना जॉइन की और 1998 में उसे हिरासत में ले लिया गया।


सिंधियों पर शुरू हुये हमले और फिर सुरेश बहादुरमल कलानी उर्फ़ ‘पप्पू’ कलानी बना मसीहा:

1986 का जून का महीना और पिछले तीन दिनों से पूरे शहर की दुकानें, ऑफिस, स्कूल बंद पड़े हुये थे। कारण था – रमाकांत चव्हाण नाम के एक ऑटो यूनियन लीडर का मर्डर और इस मर्डर ने महाराष्ट्र के मूल निवासियों (महाराष्ट्रियन) और सिंधियों के बीच टेंशन को बढ़ा दिया था। सिंधियों को इस हत्या का ज़िम्मेदार मानकर खास तौर पर टारगेट किया जा रहा था। गर्मी, उमस और एक अनहोनी की आशंका उल्हासनगर के लोगों की बैचेनी को बहुत बढ़ा रही थी, उनका कहना था कि उन्हें अनहोनी की एक अजीब सी दुर्गन्ध होती है। उनका एक लिजलिजा सा एहसास होता है।

उस अघोषित कर्फ्यू सी स्थिति में सुरेश नाम का एक सिंधी, न जाने किस मोटिवेशन किस महत्वाकांक्षा के चलते इतने टेंशन और इतने डर के माहौल में खुली जीप में महाराष्ट्रियन क्षेत्र में घुस गया और हवा में तीन-चार राउंड फ़ायर किए, और पक्षियों के उड़ने और चिल्लाने की आवाज़ों के बीच वापस लौट आया। ये ‘अमिताभ बच्चन’ का दौर था. आम आदमी उस जैसे ही किसी करैक्टर को ईश्वर की तरह पूजने को तैयार थे, और जो थोड़े से महत्वाकांक्षी थे वो उसकी तरह बनना चाहते थे। फिर सिंधियों को उल्हासनगर में उनका ‘अमिताभ बच्चन’ मिल गया था। उसने सिंधियों की रक्षा की थी और सिन्धी व्यापारियों के साथ कोई घटना ना हो इसका वो पूरा ख्याल रखता था, जिसके बाद उल्हास नगर में सिन्धी समाज काफी मजबूत हुआ और सुरक्षित हुआ।

लेकिन उल्हासनगर का ये हीरो – सुरेश बहादुरमल ‘पप्पू’ कलानी, कोई कुली या कोई अनाथ नहीं, वहां के अमीर शराब व्यापारी का लड़का था. उसके चाचा धुनिचंद कांग्रेस में थे। सनद रहे, ये कांग्रेस 1986 की कांग्रेस थी, 2018 की नहीं। सुरेश बहादुरमल कलानी ने अपने चाचा के कहने पर उल्हासनगर से नगर परिषद का चुनाव लड़ा और बड़ी आसानी से जीत गया।इस जीत के चलते पप्पू कलानी को कांग्रेस का कैंडिडेट घोषित कर दिया गया, और वो विधानसभा का भी चुनाव जीता, लेकिन ये 1990 की बात है. बीच के चार साल भी कम रोचक नहीं हैं।


बेहरानी वर्सेज़ कलानी :

1986 में कई सालों बाद कांग्रेस महाराष्ट्र नगर परिषद में मज़बूती से वापस आई थी. पार्टी के वरिष्ठ नेता गोप बेहरानी को परिषद के अध्यक्ष पद के लिए सबसे योग्य माना गया लेकिन चूंकि कलानी चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे और उन्हें ही कांग्रेस का अज्ञातवास समाप्त करने का श्रेय दिया गया था इसलिए एक समझौता हुआ और कहा गया कि कलानी पहले 30 महीनों के लिए अध्यक्ष होंगे और शेष अवधि के लिए बेहरानी होंगे। 30 महीने समाप्त हुए और कलानी ने सीट छोड़ने से इंकार कर दिया। ये धोखा कलानी और बेहरानी परिवारों के बीच पारिवारिक झगड़े की नींव की ईंट था।


गैंग्स ऑफ़ उल्हासनगर :

अनुराग कश्यप की फ़िल्म की तरह यहां से शुरू हुआ दो परिवारों के बीच का खूनी खेल, जब बेहरानियों को एहसास हुआ कि उल्हासनगर के कांग्रेस जिला अध्यक्ष धुनिचंद कलानी के चलते शहर में उनका बोलबाला नहीं हो सकता तो उन्होंने कथित तौर पर अप्रैल, 1989 में धुनिचंद की हत्या कर दी थी, मतलब विधानसभा चुनावों के ठीक एक साल पहले, कलानी के चाचा की हत्या कर दी गई और बेहरानियों को इस हत्या का दोषी माना गया। पप्पू कलानी ने अपने चाचा की हत्या का बदला लेने के लिए कसम खाई, और फिर शुरू हुआ हत्याओं का दौर, उल्हासनगर में हो रहे एक के बाद एक मर्डर ने सिंधियों के इस शहर को हिलाकर रख दिया था और इस पूरे काण्ड के दौरान 22 लोग मारे गये कहा जाता था कि उल्हासनगर में हर मंगलवार एक कत्ल ज़रूर होता था। ‘कम से कम’ एक कत्ल।

1990 के शुरुआती महीनों में ही गोप बेहरानी मारा गया था. गोपाल राजवानी का बॉडीगार्ड मारुती जाधव भी मारा गया, लेकिन मरने से पहले उसने पप्पू कलानी को अपनी हत्या का ज़िम्मेदार माना। पप्पू कलानी ने पर्सनली उसे मारा था। इस सब के चलते पप्पू कलानी को कांग्रेस से निकाल दिया गया, लेकिन शिकंजा अभी और कसा जाना था। खैर पप्पू कालानी के कई किस्से और भी मशहूर है, बताया जाता है कि दाउद और छोटा राजन भी उससे उलझने से कतराते थे और उससे दूर ही रहते थे, क्यूंकि दोनों की टक्कर में पप्पू कालानी के पास भी कई खूंखार आदमी थे और उस पर सत्ता का हाथ भी था। उसके ऐसे कई किस्से है जो काफी रोचक और खौफनाक है।