पति बरी हो जाने के बाद भी क़ानूनी पेंच में फंसाये रखना, मानसिक क्रूरता, हाईकोर्ट ने बदला फैमिली कोर्ट का आदेश।

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति या उसके परिजनों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करना स्वतः मानसिक क्रूरता नहीं है। हालांकि, जब आरोपी अदालत से बाइज्जत बरी हो चुके हों और इसके उपरांत भी मुकद्दमों की कानूनी लड़ाई लगातार जारी रखी जाए, तो इससे पति को होने वाली मानसिक प्रताड़ना व तनाव निश्चित रूप से क्रूरता की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए विवाह विच्छेद (तलाक) का फैसला सुनाया है।

यह था पूरा मामला :

जांजगीर निवासी विशंभर प्रसाद राठौर का विवाह 2 जून 2015 को संपन्न हुआ था। शादी के कुछ समय पश्चात ही दांपत्य जीवन में कलह शुरू हो गई। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी का व्यवहार अनुचित था और उसने परिवार की शांति भंग की। इसके साथ ही विवाह पूर्व पत्नी की मानसिक बीमारी संबंधी जानकारी छिपाने का भी आरोप लगाया गया। इन्हीं आधारों को लेकर पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने 8 अगस्त 2019 को खारिज कर दिया था।

दहेज प्रताड़ना सहित कई केस दर्ज, सभी में हुए बरी :

विवाद गहराने पर पति और उसके परिवार के सात सदस्यों पर दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया गया। इस मामले में विचारण अदालत ने 14 दिसंबर 2023 को पति व परिजनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बावजूद कानूनी प्रक्रिया थमी नहीं; पत्नी द्वारा बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ पेश अपील भी 7 मार्च 2025 को खारिज हो गई। इससे पूर्व 23 अगस्त 2024 को घरेलू हिंसा से संबंधित प्रकरण भी निरस्त किया जा चुका था।

सतत कानूनी संघर्ष को अदालत ने माना उत्पीड़न :

जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न नजीरों का उल्लेख किया। पीठ ने रेखांकित किया कि केवल मुकद्दमा दर्ज कराना मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता, लेकिन आपराधिक मामलों में दोषमुक्त होने के बाद भी यदि लगातार कानूनी कार्यवाही जारी रखी जाए, तो इससे व्यक्ति को गंभीर मानसिक आघात और तनाव से गुजरना पड़ता है।

बीमारी नहीं, मुकद्दमों का तनाव बना तलाक का आधार :

हाईकोर्ट ने पत्नी की कथित मानसिक बीमारी के आधार को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक का आधार बीमारी नहीं, बल्कि वर्षों तक चली अंतहीन कानूनी कार्यवाही और उससे उत्पन्न मानसिक उत्पीड़न है। इन आधारों पर फैमिली कोर्ट के पूर्व फैसले को बदलते हुए खंडपीठ ने विवाह संबंध समाप्त करने का विधिवत आदेश पारित किया।