डोंगरगढ़ : छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर विंध्य पर्वत शृंखलाओं की सुरम्य वादियों में स्थित सुप्रसिद्ध शक्तिपीठ डोंगरगढ़ इन दिनों आस्था और भक्ति के रंग में सराबोर है। पहाड़ों की ऊंचाइयों पर विराजमान मां जगदंबा के दर्शन के लिए देश भर से लाखों श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। जहां आस्था का दुर्गम मार्ग 1100 सीढ़ियों के कठिन सोपानों से होकर गुजरता है, वहीं भक्तों की अटूट मनोकामनाएं ज्योति कलश बनकर प्रज्वलित हो रही हैं। यह वही पावन धाम है, जहां सनातन वैदिक परंपराओं के साथ वनवासी व आदिवासी संस्कृति का अद्भुत एवं जीवंत समन्वय देखने को मिलता है।
पहाड़ों पर शक्ति की अधिष्ठात्री, बड़ी मां और छोटी मां का पावन दरबार :
राजनांदगांव जिले की सुप्रसिद्ध धर्मनगरी डोंगरगढ़ का नाम स्मरण होते ही पहाड़ों की विहंगम ऊंचाइयों पर आसीन मां बम्लेश्वरी की अलौकिक छवि आंखों के सामने उभर आती है। यह केवल एक धार्मिक देवालय नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था, संकल्प और विश्वास का जाग्रत केंद्र है। दूर क्षितिज से दिखाई देने वाला माता का पहाड़ी मंदिर भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
डोंगरगढ़ तीर्थ में मां बम्लेश्वरी के दो प्रमुख स्वरूप प्रतिष्ठित हैं :
- बड़ी मां बम्लेश्वरी : पहाड़ की चोटी पर समुद्र तल से सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर स्थित दिव्य गर्भगृह।
- छोटी मां बम्लेश्वरी : पर्वत की तलहटी में स्थित मंदिर, जहां भक्तजन सहजता से दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं।
दोनों ही पावन मंदिरों में शीश नवाकर श्रद्धालु सुख, शांति, समृद्धि और परिवार के कल्याण की मंगल कामना करते हैं। सड़क और रेल मार्ग की सुदृढ़ कनेक्टिविटी तथा पहाड़ी मंदिर तक सुगम आवागमन हेतु उपलब्ध आधुनिक रज्जुमार्ग (रोपवे) इस तीर्थ को अत्यंत विशिष्ट बनाते हैं। विशेषकर त्यौहारी माहौल में पड़ोसी राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा ओड़िशा सहित देश के कोने-कोने से अंतर्राज्यीय श्रद्धालु भारी संख्या में यहां पहुंचते हैं। नवरात्र के पावन पर्व पर डोंगरगढ़ की वीथिकाएं, मंदिर परिसर और संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र ‘जय माता दी’ के गगनभेदी जयघोष से गुंजायमान हो उठता है।
इतिहास, लोकमान्यता और मां की महिमा और राजा विक्रमादित्य से जुड़ा गौरवशाली अतीत :
मां बम्लेश्वरी धाम की पहचान जितनी इसकी भव्यता से है, उतनी ही इसकी जड़ें प्राचीन लोकमान्यताओं और ऐतिहासिक आख्यानों में गहराई से जुड़ी हैं। स्थानीय जनश्रुतियों और धार्मिक परंपराओं में इस सिद्धपीठ के उद्भव को न्यायप्रिय चक्रवर्ती सम्राट राजा विक्रमादित्य के काल से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य की कठोर और निष्काम तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति भगवती ने इस सुरम्य पर्वत पर दर्शन दिए थे। यद्यपि इस पावन आख्यान की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों का परीक्षण आवश्यक है, किंतु जनमानस की अगाध आस्था में इस लोककथा का स्थान अत्यंत पूज्य और अद्वितीय है।
चैत्र और क्वार नवरात्र में उमड़ती है आस्था :
समय के साथ मां बम्लेश्वरी का यह दिव्य दरबार केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि समूचे राष्ट्र के श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यूं तो वर्ष भर मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना व वैदिक विधान संपन्न होते हैं, परंतु चैत्र और क्वार नवरात्र के पावन अवसर पर यहां का आध्यात्मिक वातावरण चरम पर पहुंच जाता है। इन नौ दिनों में माता की विशेष आराधना के साथ युगीन पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। इनमें:
- पंचमी भेंट: लोक परंपरा और पारंपरिक समर्पण का विशिष्ट पर्व।
- सप्तमी का कालरात्रि अभिषेक: मध्यरात्रि में संपन्न होने वाला अलौकिक व तांत्रिक-वैदिक अभिषेक।
इन अनुष्ठानों की दिव्यता का साक्षी बनने के लिए श्रद्धालु विशेष उत्साह के साथ माता के दरबार में शीश नवाने पहुंचते हैं।
मनोकामना ज्योत की अखंड लौ और नवमी पर 901 कलशों का ऐतिहासिक विसर्जन :
मां बम्लेश्वरी धाम में नवरात्र के दौरान प्रज्वलित होने वाली ‘मनोकामना ज्योत’ श्रद्धा और विश्वास की अनूठी मिसाल है। मान्यता है कि श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं—चाहे वह परिवार की सुख-समृद्धि हो अथवा जीवन की जटिल बाधाओं की मुक्ति—को लेकर माता के दरबार में अखंड ज्योति प्रज्वलित करवाते हैं। हर एक लौ के पीछे एक गहरी आस्था, निष्काम प्रार्थना और मां के प्रति समर्पण का भाव जुड़ा होता है।
नवरात्र की एकम तिथि से नौ दिनों तक अहर्निश प्रज्वलित रहने वाली इन ज्योतियों का नवमी के दिन विसर्जन का दृश्य अत्यंत भावविभोर कर देने वाला होता है। तलहटी स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर से मनोकामना ज्योत कलशों को श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक सिर पर धारण कर सुव्यवस्थित लाईन में कतारबद्ध होकर प्राचीन महावीर मंदिर तालाब की ओर प्रस्थान करते हैं।
मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के अनुसार, नवमी के दिन 901 ज्योति कलशों के विसर्जन की परंपरा इस महापर्व का सबसे प्रमुख आकर्षण है। इस अभूतपूर्व आयोजन को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने का उल्लेख भी प्रमुखता से किया जाता है, जिसकी सटीक प्रविष्टि और रिकॉर्ड श्रेणी की आधिकारिक पुष्टि रिकॉर्ड्स के माध्यम से संधारित की जाती है। यहां जलती हर लौ यह प्रमाणित करती है कि जब विश्वास आस्था से जुड़ता है, तो एक साधारण-सा दीप भी अलौकिक शक्ति बन जाता है।
1100 सीढ़ियों का संकल्प, सवा करोड़ से उन्नत रोपवे और सुरक्षा व्यवस्था :
मां बम्लेश्वरी के दर्शन की यात्रा केवल एक सामान्य देव-दर्शन नहीं, बल्कि शारीरिक संकल्प और आत्मिक साधना का अनुभव है। पर्वत शिखर पर स्थित बड़ी मां के दरबार तक पहुंचने के लिए भक्तों को लगभग 1100 सीढ़ियों की खड़ी चढ़ाई पूरी करनी होती है। हर सीढ़ी के साथ गूंजता जयकारा भक्तों की थकान को भक्ति रस में बदल देता है।
शारीरिक रूप से असमर्थ, वृद्ध अथवा अल्प समय में दर्शन की इच्छा रखने वाले भक्तों के लिए रोपवे की सुविधा अत्यंत वरदान सिद्ध होती है। नीचे से ऊपर तक की यह यात्रा प्राकृतिक वादियों और घने जंगलों के विहंगम दृश्यों का अप्रतिम अनुभव कराती है।
मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के अनुसार, बीते लगभग छह महीनों में रोपवे प्रणाली को अत्याधुनिक बनाने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढालने के लिए करीब सवा करोड़ रुपये की लागत से सुदृढ़ीकरण किया गया है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए नियमित मेंटेनेंस की जाती है ताकि भीड़भाड़ के समय संचालन कभी ठप्प न पड़े। मंदिर क्षेत्र में पुलिस बल तथा प्रशासन द्वारा त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित की गई है, जिससे किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके और किसी भी भक्त को दर्शन से इंकार न करना पड़े। भीड़ नियंत्रण के लिए ऑनलाईन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से दर्शनार्थियों को व्यवस्थित लाईन में आगे भेजा जाता है।
सनातन परंपरा और आदिवासी संस्कृति का संगम , साथ ही ‘पंचमी भेंट’ में आंगा देव का मिलन :
मां बम्लेश्वरी धाम की सबसे अनुपम विशेषता यहां दिखाई देने वाला सनातन और आदिवासी संस्कृति का अद्वितीय समन्वय है। नवरात्र के दौरान आयोजित होने वाली ‘पंचमी भेंट’ इस समरसता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस अवसर पर वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों से आदिवासी समाज के पूज्य बैगा, राज बैगा के नेतृत्व में पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर माता के दरबार पहुंचते हैं।
इस पावन परंपरा में आदिवासी समाज के कुलदेवता ‘आंगा देव’ और मां बम्लेश्वरी के दिव्य मिलन का विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व है। पारंपरिक वेशभूषा, लोकनृत्य और विशिष्ट पूजा-विधि के बीच संपन्न होने वाला यह अनुष्ठान छत्तीसगढ़ की बहुरंगी सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करता है। सनातन पूजा-पद्धति और वनवासी परंपराएं यहां एकाकार होकर माता की आराधना में लीन दिखाई देती हैं। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक समरसता और अटूट विश्वास का अमर प्रतीक है।
भक्ति और समर्पण का नया प्रतीक – दरबार में विराजेगा पीतल का भव्य बब्बर शेर :
मां बम्लेश्वरी की अगाध महिमा के चलते भक्तगण अपनी सामर्थ्य अनुसार माता के चरणों में अमूल्य भेंट अर्पित करते हैं। इसी कड़ी में हाल ही में एक निष्ठावान भक्त ने माता के वाहन के रूप में शुद्ध पीतल से निर्मित विशाल बब्बर शेर की भव्य प्रतिमा मंदिर को दान स्वरूप भेंट की है। बब्बर शेर को मां दुर्गा के असीम शौर्य, शक्ति और पराक्रम के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
मंदिर ट्रस्ट समिति के अनुसार, इस भव्य प्रतिमा को शीघ्र ही विधिवत वैदिक मंत्रोच्चार के साथ मुख्य मंदिर परिसर में स्थापित किया जायेगा। इस स्थापना के उपरांत माता के दरबार में दर्शनार्थियों को एक और अलौकिक धार्मिक प्रतीक के दर्शन करने का सुअवसर प्राप्त होगा।
डोंगरगढ़ का मां बम्लेश्वरी धाम वह पावन तीर्थ है जहां आस्था की लौ हर मन को आलोकित करती है। 1100 सीढ़ियों की साधना हो या सवा करोड़ से संवरा आधुनिक रोपवे, 901 मनोकामना ज्योतियों का प्रवाह हो या पंचमी भेंट में आंगा देव का मिलन—यह सिद्धपीठ छत्तीसगढ़ के मस्तक पर गौरव का वह तिलक है, जिसके दर्शन हेतु हर वर्ष लाखों श्रद्धालु खिंचे चले आते हैं।



