खैरागढ़ में राज्योत्सव कवरेज के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकार से मारपीट : सीएएफ आरक्षक निलंबित, देखें विडियो।

खैरागढ़ : पत्रकारों को हमेशा सुरक्षा का भय सताता रहता है, वहीँ कुछ घटनायें उनके लिये मुश्किलें बढ़ाने वाली होती है, ऐसे ही खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के राजा फतेह सिंह मैदान में आयोजित राज्योत्सव समारोह की कवरेज कर रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ संवाददाता किशोर सोनी के साथ छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) के जवान द्वारा की गई कथित अभद्रता और मारपीट का मामला प्रकाश में आने के बाद समूचे क्षेत्र में तनाव और भारी आक्रोश व्याप्त हो गया है। इस शर्मनाक घटना का दृश्य मोबाईल कैमरों में कैद हो गया और वीडियो ऑनलाईन सोशल मीडिया मंचों पर तेजी से प्रसारित होते ही जिले सहित पूरे प्रदेश के पत्रकार जगत में तीखा रोष फैल गया। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उच्चाधिकारियों के निर्देश पर 8वीं बटालियन छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, राजनांदगांव ने त्वरित अनुशासनात्मक कार्यवाही करते हुए आरोपी आरक्षक क्रमांक 319 रजनीकांत उपाध्याय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। दूसरी ओर, इस बर्बरता के विरोध में जिला मुख्यालय पर पत्रकारों ने थाने के सामने अनिश्चितकालीन धरना देकर घटना में संलिप्त सभी वर्दीधारियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्यवाही और दंडात्मक धाराओं में मुकद्दमा दर्ज करने के लिये मोर्चा खोल दिया है।

राज्योत्सव कवरेज के दौरान उपजा विवाद और बल प्रयोग :

प्राप्त विस्तृत विवरण के अनुसार, छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में राजा फतेह सिंह मैदान में भव्य राज्योत्सव का आयोजन किया जा रहा था। इसी दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संवाददाता किशोर सोनी जनहित से जुड़े समाचारों का संकलन और समारोह का सीधा प्रसारण कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कवरेज के दौरान व्यवस्था और आवागमन को लेकर सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात सीएएफ जवान से उनकी कहासुनी हो गई। विवाद इतना बढ़ा कि आरक्षक ने अपनी मर्यादाओं को भूलते हुए पत्रकार के साथ खुलेआम दुर्व्यवहार किया और कथित तौर पर हाथापाई करते हुए जमकर मारपीट की। घटना का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला पूरे क्षेत्र में चर्चा का केंद्र बन गया। वीडियो फुटेज में आरक्षक द्वारा पत्रकार पर अनुचित शारीरिक बल का प्रयोग करते हुए स्पष्ट देखा जा सकता है। घटना के तुरंत बाद मीडियाकर्मियों ने पुलिसिया रवैये पर कड़े सवाल खड़े किये। पत्रकारों का कहना है कि यदि कवरेज के संबंध में सुरक्षा बलों को किसी प्रकार की आपत्ति थी, तो विधि सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए नियमानुसार कार्यवाही की जानी चाहिये थी, न कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर इस तरह का अमानवीय बल प्रयोग किया जाना चाहिये था।

आधिकारिक निलंबन आदेश जारी, वाहिनी मुख्यालय संबद्ध :

इस मामले के तूल पकड़ते ही 8वीं बटालियन, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल, राजनांदगांव की ओर से 2 नवंबर 2026 को आधिकारिक निलंबन आदेश जारी किया गया। इस आदेश में पुलिस अधीक्षक, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के गोपनीय पत्र का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि राज्योत्सव के दौरान कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर तैनात आरक्षक रजनीकांत उपाध्याय द्वारा पत्रकार किशोर कुमार सोनी के साथ अशोभनीय व्यवहार और मारपीट किये जाने तथा पुलिस सेवा की सामान्य आचार संहिता के गंभीर उल्लंघन के आरोपों के आधार पर यह दंडात्मक कार्यवाही की गई है। निलंबन का यह आदेश 2 नवंबर 2026 से ही प्रभावी कर दिया गया है। निलंबन अवधि के दौरान आरक्षक को नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा तथा उन्हें अग्रिम जांच पूर्ण होने तक वाहिनी मुख्यालय, राजनांदगांव में संबद्ध किया गया है।

थाने के सामने लामबंद हुए पत्रकार, धरने पर बैठकर उठाई मांगें :

इस घटना के विरोध में जिला पत्रकार संघ के पदाधिकारियों सहित जिले भर के प्रेस प्रतिनिधि, छायाकार और मीडियाकर्मी एकजुट होकर खैरागढ़ थाने के सामने धरने पर बैठ गये। पत्रकारों ने पुलिस और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय व निष्पक्ष जांच कराने की मांग रखी। आंदोलनरत पत्रकारों ने स्पष्ट किया कि घटना के समय वहां उपस्थित अन्य पुलिसकर्मियों की भूमिका भी तय की जाये, जिन्होंने इस हिंसा को रोकने का प्रयास नहीं किया। पत्रकारों ने मांग की कि दोषी पाये जाने वाले सभी कर्मियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत आपराधिक मुकद्दमा दर्ज कर वैधानिक कार्यवाही अमल में लाई जाये। इसके साथ ही पीड़ित संवाददाता किशोर सोनी और उनके परिवार को तत्काल पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग उठाई गई। पत्रकारों ने दो-टूक कहा कि पत्रकारिता के दायित्वों का निर्वहन करते समय यदि तंत्र को कोई असुविधा या आपत्ति हो, तो उसका समाधान संवैधानिक और कानूनी दायरे में होना चाहिये। किसी भी सूरत में पत्रकारों के साथ मारपीट और उत्पीड़न स्वीकार नहीं किया जायेगा।

निलंबन के बाद निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्यवाही पर टिकी नजरें :

आरक्षक के निलंबन के बाद अब मीडिया जगत की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या प्रशासन केवल निलंबन जैसी खानापूर्ति तक सीमित रहेगा या मामले में पारदर्शी न्यायिक जांच कराकर कठोर दंडात्मक कदम भी उठायेगा। पत्रकारों का कहना है कि जब तक पूरे मामले में लिप्त सभी जिम्मेदारों पर कठोर मुकद्दमा दर्ज कर वैधानिक कार्यवाही नहीं की जायेगी, तब तक यह आंदोलन और तेज किया जायेगा। यदि स्थानीय स्तर पर निष्पक्ष जांच से इंकार किया गया, तो इस मुद्दे को राजधानी स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार और पत्रकार सुरक्षा मंचों तक ले जाया जायेगा।

स्वतंत्र पत्रकारिता के समक्ष निरंतर बढ़ती गंभीर चुनौतियां :

  • भौतिक हमले और धमकियां: ज़मीनी स्तर पर जनता की आवाज उठाने वाले निर्भीक पत्रकारों को अक्सर असामाजिक तत्वों और सत्ता के नशे में चूर सुरक्षा तंत्र की धमकियों, हिंसक हमलों और शारीरिक चोटों का जोखिम उठाना पड़ता है।
  • कानूनी उत्पीड़न और फर्जी मुकद्दमे: सच उजागर करने या तंत्र से तीखे सवाल पूछने पर पत्रकारों की आवाज दबाने के लिये उन पर फर्जी मुकद्दमे लाद दिये जाते हैं और बदले की भावना से दुर्भावनापूर्ण कानूनी कार्यवाही की कोशिशें की जाती हैं।
  • कार्यक्षेत्र में सुरक्षा का अभाव: संवेदनशील परिस्थितियों में समाचार संकलन के दौरान क्षेत्रीय पत्रकारों को किसी भी प्रकार का संस्थागत सुरक्षा घेरा नहीं मिलता, जिससे विपरीत परिस्थितियों में उनका कार्य करना अत्यंत दुष्कर हो जाता है।