रायपुर : जैसा की हम चलते है राज्य की स्थापना की शुरुआत में, जहाँ कांग्रेस की सत्ता ही मजबूत थी, जो की बड़ी मुश्किलों से बाहर हुई थी, मतलब उस समय कांग्रेस के पक्ष में ही बहुमत था, जिसमें जोड़तोड़ करके बड़ी मुश्किल से भाजपा में तीन बार सत्ता में रही, धीरे – धीरे उनका बनाया हुआ मजबूत वोटबैंक अचानक हाथ से निकल गया।
सत्ता की चाबी के लिए किसी एक पार्टी को चुनाव में कम से कम 40 फीसदी वोट शेयर जरूरी है। वहीं ऐसी सीटें जहां तीसरी पार्टी मजबूत होती है, वहां महज 32 फीसदी वोट पर ही जीत पक्की हो जाती है। राज्य बनने के बाद हुए पिछले चारों चुनाव में वही पार्टी जीती है, जो 40 फीसदी वोट शेयर से ऊपर है या उसके करीब है।
2003, 2008 और 2013 के चुनाव में भाजपा के वोट शेयर 40 फीसदी के करीब या उससे ऊपर रहे हैं। इसलिए तीनों चुनाव भाजपा जीती है। 2018 में भाजपा के वोट शेयर गिरकर 33 फीसदी के आसपास पहुंच गया और उसे सत्ता गंवानी पड़ गई। वहीं कांग्रेस 43 फीसदी वोट शेयर के साथ सत्ता हासिल करने में कामयाब रही। यदि दोनों ही पार्टियों के पिछले चार चुनाव के वोट शेयर का औसत निकाला जाए तो भाजपा के मुकाबले कांग्रेस का वोट शेयर ज्यादा है। भाजपा का वोट शेयर 38.4 है और कांग्रेस का 39.67 प्रतिशत। ओवरआल औसत देखा जाए तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर है, लेकिन वह चार में से एक ही चुनाव जीत पाई है। इसकी सबसे बड़ी वजह है भाजपा के वोट शेयर में ड्रेमेटिक तरीके से 8 प्रतिशत की गिरावट आना। 2018 के चुनाव में भाजपा के 8 फीसदी वोट शेयर गिर गए। इसलिए चार चुनाव का औसत कांग्रेस के मुकाबले कम हो गया।
दूसरी तरफ इस बार भाजपा ने उन्हीं चेहरों को दुबारा मौका दिया है, जिनके कारण आम जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर किया, 2018 के चुनाव में सत्ता से बाहर जाने का मुख्य कारण जो निकला था वो था एंटी इनकम्बेंसी , ये समस्या जिन नेताओं से थी उन्हीं को टिकट दी गई है, एक तरफ हारे हुये मूणत को वापस टिकट दी गई है, वहीँ दूसरे तरफ हारे हुये सुन्दरानी को टिकट क्यूँ नहीं दी गई है, जिसके कारण एक समाज विशेष के वोट कटेंगे।
मतदाताओं ने राज्य बनने के बाद हुए 2003, 2008 और 2013 के चुनावों में कभी अपना मूड नहीं बदला। हर चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के वोट शेयर बढ़ते रहे। भाजपा चुनाव जीतती रही और कांग्रेस एक-दो प्रतिशत वोट शेयर के मामूली अंतर से हारती रही है।
2003 : एनसीपी ने काटे कांग्रेस के वोट
2003 में कांग्रेस सरकार बना लेती, अगर एनसीपी ने वोट नहीं काटे होते। कांग्रेस से बगावत कर विद्याचरण शुक्ला ने एनसीपी ज्वाइन कर ली। एनसीपी ने 1 सीट जीती, लेकिन बड़ी संख्या में कांग्रेसी वोट कट गए। एनसीपी का वोट शेयर 7.02% रहा। इतना वोट कांग्रेस को मिलता तो शेयर 43% से ज्यादा हो जाता।
पिछले 4 चुनाव में औसत
राजनीतिक पार्टियों का वोट शेयर : 46 सीट पर मिलती है जीत
भाजपा
2003 : 7 प्रतिशत वोट शेयर के बावजूद एनसीपी को 1 सीट मिली
पार्टी सीटें वोट वोट शेयर
भाजपा 50 3789914 39.26%
कांग्रेस 37 3543754 36.71%
बसपा 02 429334 4.45%
एनसीपी 01 677983 7.02%
निर्दलयी 00 686942 7.12%
3 2018 के चुनाव में भी सरकार बदली। इस बार दोनों पार्टियों के बीच वोट शेयर का अंतर 10.07 प्रतिशत रहा और कांग्रेस 53 सीटों पर बढ़त में रही। कांग्रेस ने 68 और भाजपा ने महज 15 सीटें ही जीत पाई। इस तरह 2.5% वोट शेयर बढ़ने पर भाजपा की 13 सीटें बढ़ गईं, वहीं कांग्रेस के 10% वोट बढ़ने से 53 सीटें बढ़ीं।
2.55%के साथ भाजपा ने बदली सरकार
1 राज्य निर्माण के बाद चार चुनाव हुए। इसमे दो बार सरकारें बदली हैं। राज्य निर्माण से पहले अविभाजित मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। राज्य बनने के बाद बहुसंख्य विधायकों के कारण छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को विरासत में सरकार मिल गई।
10 प्रतिशत वोट बढ़ने से कांग्रेस ने ली 53 सीटों से बढ़त
पार्टी भाजपा कांग्रेस
औसत 38.4% 39.67%
जीत 3 बार 1 बार
2 2003 में कांग्रेस के अंतर्कलह की वजह से भाजपा को पैर जमाने का मौका मिला। आंतरिक फूट के कारण कांग्रेस का वोट शेयर 36.71% रहा, इस वजह से पार्टी 37 सीटों पर सिमट गई। वहीं भाजपा ने 39.26% वोट शेयर के साथ 50 सीटें जीतीं। यानी वोट शेयर का अंतर 2.55% था, जबकि भाजपा 13 सीटों से बढ़त पर रही।
छग में सत्ता के लिए चाहिए 40% वोट :
चार चुनावों में कांग्रेस का औसत वोट प्रतिशत भाजपा से एक प्रतिशत अधिक, फिर भी 3 बार जीती भाजपा
2013
1117321 बढ़े
1031338 बढ़े
वोट शेयर
वोट चेंज
वोट का गणित
01
1.66
0.71
01
39 सीटें
40.29%
41.04%
49 सीटें
कांग्रेस
भाजपा
606623 बढ़े
544020 घटे
वोट शेयर
वोट चेंज
वोट का गणित
01
1.92
1.07
00
38 सीटें
38.63%
40.33%
50 सीटें
2008
कांग्रेस
भाजपा
876182 बढ़े
658442 घटे
वोट शेयर
वोट चेंज
वोट का गणित
29
2.75
8.07
34
68 सीटें
43.04%
32.97%
15 सीटें
2018
कांग्रेस