नई दिल्ली : ‘सीएए किसी की नागरिकता छीनने वाला नहीं बल्कि नागरिकता देने वाला कानून है’, भारत सरकार ये बात बार-बार कह चुकी है मगर देश के बहुत से संगठन खासकर असम के छात्र संगठन, राजनीतिक दल और नेता सरकार की बातों से पूरी तरह मुतमइन नहीं। वे इससे जुड़ी भविष्य की आशंकाओं की तरफ इशारा कर रहे हैं। सीएए के खिलाफ इन्हीं आशंकाओं को लेकर तकरीबन 200 से अधिक याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई थी। इन याचिकाओं पर आज सुनवाई होने जा रही।
भगवान राम को अपना अपना राम – राम भेजें हनुमान चालीसा अनुवाद सहित सुने , लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=rJDZQ4R9fYs
2019 का नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और हाल ही में केंद्र सरकार की ओर जारी किए गए इससे संबंधित नियम संवैधानिक तौर पर दुरुस्त हैं या नहीं, इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई होनी है। देश के मुख्य न्यायधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिसरा की पीठ 230 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। पिछले हफ्ते 11 मार्च (सोमवार) को भारत सरकार सीएए के तहत नागरिकता देने वाले नियमों होले से लेकर आई जिसका अर्थ था कि चार बरस से लटका हुआ विवादित कानून सीएए लागू हो चुका है।
भारत की संसद से 11 दिसंबर, 2019 को सीएए पारित हुआ और अगले ही दिन इसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई। केरल के राजनीतिक दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में सीएए को चुनौती दी और फिर सैंकड़ो याचिकाएं इसके खिलाफ गुजरते वक्त के साथ दायर होती चली गईं। ये कानून 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आने वाले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता देता है। नागरिकता को लेकर हमारे पास 1955 का कानून है जो कई बार संशोधित किया जा चुका है। सीएए भी इसी कानून में संशोधन का नाम है।
संकट दूर करने के लिये संकट मोचन हनुमान जी के हनुमान चालीसा को गुनगुनाने के लिये लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=lv0wP9lOqMs
2019 में सीएए के जरिये असल नागरिकता कानून की धारा 2(1)(b) में एक नए प्रावधान को जोड़ दिया गया। इस बदलाव ने ‘अवैध प्रवासियों’ को नए सिरे से परिभाषित किया और पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के उन हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को अवैध प्रवासी मानने से इनकार कर दिया जो 1920 के पासपोर्ट कानून और 1946 के विदेशी कानून के तहत भारत आए थे। यानी ये सभी लोग अब नागरिकता कानून के मातहत भारत के नागरिक हो सकते थे। हां, यहीं ये बात भी दर्ज की जानी चाहिए की ये कानून देश के और दूसरे इलाकों की तरहअसम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा जैसे राज्यों के आदिवासी इलाकों में लागू नहीं होती।



