जगदलपुर : नक्सलवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी। नक्सल शब्द की उत्पत्ति भी इसी गांव से हुई है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने यहां सत्ता के ख़िलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन शुरू किया था। जिसमें इसके पीछे गंभीर सामाजिक – आर्थिक कारण हैं, नक्सलियों का कहना है कि वे उन गरीबों और आदिवासियों के लिए लड़ रहे हैं, जिनकी सरकार ने दशकों से अनदेखी की है, नक्सलियों का वित्तीय आधार विविध है। नक्सली नियंत्रण वाले कुछ क्षेत्रों में काम करने वाली खनन कंपनियों से होने वाले मुनाफ़े का लगभग 3% कर लेते हैं?
सरकारों के द्वारा नक्सलवादी आंदोलन का दमन करने के प्रयासों से नक्सलवाद के रुझान में आज भी कोई कमी नहीं आई है। बल्कि नक्सलवादी हिंसक गतिविधियों में वृद्धि और उनके कैडर में विस्तार हुआ है। यह समस्या राष्ट्र के लिये बहुत ही हानिकारक है, जिससे क्षेत्र का विकास रुक जाता है।
वहीँ इस मामले पर गृहमंत्री अमित शाह और विष्णु सरकार ने नक्सलियों की समस्या पर कड़ा रुख किया है, और सरकार ने बातचीत के रास्ते र्भी रखे है, जबकि नक्सली लगातार जवानों की हत्यायें कर रहे है, वहीँ अब जब सरकार ने दबाव बना दिया है तो नक्सली बातचीत के लिये तैयार हुये है। इसी मामले में नक्सलियों ने ईसाई और मुस्लिम हितों की रक्षा की मांग के साथ सरकार से सशर्त वार्ता की मांग रखी है। जबकि नक्सल आन्दोलन नक्सलियों द्वारा गरीबों और आदिवासियों के लिये लड़ना बताया जाता है। वहीँ नक्सलियों द्वारा लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया के बीच भाकपा (माओ) की दंडकारण्य जोनल कमेटी की ओर से जारी बयान में प्रदेश के उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा की तरफ से बीजापुर के जंगलों सहित बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में लगातार दिए जा रहे वार्ता प्रस्ताव पर प्रश्न खड़ा किया गया है।
नक्सलियों का दावा है कि किसानों, मजदूरों और महिलाओं, मध्यम वर्गीय लोगों, छोटे और मंझोले पूंजापतियों, विशेष सामाजिक तबकों यानी आदिवासियों, दलितों, धामिक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के हितों को छोड़कर उनका कोई हित नहीं है। जबकि उनके मुसलमान औरईसाई समर्थन पर सवाल उठ रहे है।
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सभी कर्मचारियों के स्थायीकरण व अन्य मांगों पर जारी बयान में लिखा गया है कि सरकार को वार्ता के लिए अनुकूल वातावरण बनाना चाहिए। इसके लिए कोई बड़ी शर्त नहीं होने का दावा करते हुए प्रवक्ता ने कहा कि सुरक्षा बलों को छह माह के लिए कैंपों तक सीमित करते हुए नए कैंप स्थापित करने की प्रक्रिया बंद की जाए। सरकार की तरफ पहले ही सशर्त वार्ता को अस्वीकृत किया जाता रहा है।
गौसेवक ओमेश बिसेन ने कहा नक्सलियों का कनेक्शन आया सामने :
गौसेवक ओमेश बिसेन ने इस मुद्दे पर कहा की गरीबों और आदिवासियों का खुद को मसीहा बताने वाले नक्सली आज मुस्लमान और ईसाईयों का पक्ष ले रहे है, वो आखिर किस आधार पर? मतलब ईसाई और मुसलमान से नक्सलियों का कनेक्शन है जो सामने आया, जबकि भोले-भाले आदिवासी हिन्दू ही है।
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