सावन मास का दूसरा सोमवार है बेहद खास, बन रहे 4 अद्भुत योग, जानें पूजा मुहूर्त और महत्व।

धर्म/ज्योतिष /संस्कृति : इस बार श्रावण में पांच सोमवार पड़ेंगे। इसकी वजह से भी सावन का महीना महत्वपूर्ण हो गया है। पहला सावन सोमवार 22 जुलाई को था। सावन मास का दूसरा सावन सोमवार व्रत 29 जुलाई को है।सावन मास का सावन सोमवार व्रत शिव पूजा के लिए विशेष महत्व वाला माना जाता है। इस साल सावन की शुरूआत ही सोमवार से हुई थी और इसका समापन भी सोमवार के दिन होगा। इस बार श्रावण में पांच सोमवार पड़ेंगे। इसकी वजह से भी सावन का महीना महत्वपूर्ण हो गया है। पहला सावन सोमवार 22 जुलाई को था। सावन मास का दूसरा सावन सोमवार व्रत 29 जुलाई को है। उस दिन सावन मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि सायं 05 बजकर 55 मिनट तक है। उसके बाद से दशमी तिथि शुरू हो जाएगी।

दूसरा सावन सोमवार  मुहूर्त और योग :

  • सावन के दूसरे सोमवार पर भरणी नक्षत्र प्रातः 10 बजकर 55 मिनट तक है, उसके बाद से कृत्तिका नक्षत्र है।
  • शुभ योग की बात करें तो  गण्ड योग सुबह से शाम 05 बजकर 55 मिनट तक है, इसके बाद वृद्धि योग प्रारंभ होगा। 
  • सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त प्रातः काल 04 बजकर 17 मिनट से 04 बजकर 59 मिनट तक है। 
  • अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 48 मिनट से बजे से 12 बजकर 42 तक है।

सावन में महत्वपूर्ण महामृत्युंजय मन्त्र, इसकी उत्पत्ति की कथा और महत्व के साथ , पूर्ण सुनना आवश्यक है : https://www.youtube.com/watch?v=L0RW9wbV1fA

कैसे करें पूजन  :
इस बार सावन मास में पांच सोमवार होंगे। सावन मास के सोमवार पर अपनी मनोकामना पूर्ण हेतु आप भगवान शिव की 108 बेलपत्रों से भगवान की पूजा करें। भगवान शिव पर एक-एक बेलपत्र अर्पित करते हुए ” ॐ साम्ब सदा शिवाय नमः “ का लगातार जाप करें। इससे आपकी मनोकामना पूर्ण होंगी और जीवन में निरंतर सफलता प्राप्त होंगी।

सावन मास का महत्व :
पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन श्रावण मास में हुआ था। उस समय समुद्र मंथन से 14 प्रकार के तत्व 14 रत्न  निकले । इनमें से 13 तत्वों व रत्नों देवताओं व दानवों ने आपस में वितरण कर लिया।  उन तत्वों में से एक तत्व हलाहल विष भी निकला। वह हलाहल विष भगवान शंकर को दिया गया। हलाहल विष भगवान शंकर ने अपने कंठ (गले) में धारण किया। उससे भगवान शंकर का गला नीला पड़ गया, इससे भगवान शंकर नीलकंठ कहलाए। परंतु उस विष  की गर्मी इतनी अधिक थी की देवताओं को  गर्मी शांत करने का कोई उपाय नहीं सूझा। इस पर चंद्रदेव को शिव शंकर ने मस्तक पर धारण किया था तथा भगवान शंकर के मस्तक पर ही गंगा अवतरित किया फर्म भी ताप कम नहीं हुआ। तब जाकर सहस्त्र जलधाराओं से भगवान शंकर का अभिषेक किया गया। तभी से भगवान शंकर पर जल चढ़ाने की परंपरा व धारणा चली आ रही है।