रायपुर : दिल्ली में एम्स की तर्ज पर स्व. अटल बिहारी वाजपेई ने सपना देखा था कि देशभर के आम आदमी को भी सस्ता और बेहतर इलाज मिले, जिसके लिये उन्होने अपने कार्यकाल में 7 एम्स की घोषणा की थी, उन्हीं में से राजधानी का एम्स भी था, जो कि टाटीबंध में उपस्थित था, उसे शुरु हुये काफी लम्बा समय हो चुका है, लेकिन अब भी वहां के जिम्मेदार संसाधनों की कमी का रोना रो रहे है। लगातार जगहों क कमी का रोना रोकर जूनियर डॉक्टर मरीजों को मेकाहारा अथवा कमीशनखोरी के चक्कर में निजी अस्पतालों में भेज रहे है। उन्हें मरीज की गंभीर स्थितियों से भी कोई मतलब नहीं है। मरीजों को अस्पताल में एडमिट होने के लिये कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है, वहीँ इलाज करवाने को लेकर भी मरीज परेशान रहते है।
बेहतर ईलाज की आस लिए मरीज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान पहुंच रहे हैं, मगर उन्हें आंबेडकर और डीके अस्पताल का रास्ता दिखाया जा रहा है। प्रतिदिन तीन हजार से ज्यादा ओपीडी का दावा करने वाला एम्स प्रबंधन रोजाना पांच से दस मरीजों को दोनों अस्पतालों में भेज रहा है। इसके लिए बेड फुल होने का एकमात्र हवाला दिया जा रहा है। आंबेडकर और डीके अस्पताल से जुड़े चिकित्सक बताते हैं कि कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब जगह नहीं होने की समस्या लेकर गंभीर स्थिति वाले मरीज आगे इलाज के लिए अस्पताल नहीं आते। उनकी स्थिति जैसी भी हो, उन्हें उपचार के लिए यहां दाखिल करना पड़ता है। रेफर किए जाने वाले सामान्य स्थिति के साथ वेंटिलेटर वाले मरीज भी होते हैं। ऐसे ही अब ताजा मामला सामने आया है, जिसमें गंभीर रूप से पीड़ित मौत से जूझ रहे यश शर्मा को मेकाहारा जाने के लिये कहा गया है। एम्स के मरीजों को दोनों अस्पताल भेजने की समस्या सालों पुरानी है।
एम्स से रेफर किये गये मरीज :
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| महीना | आंबेडकर | डीके |
| जून | 96 | 22 |
| जुलाई | 181 | 25 |
| अगस्त | 154 | 30 |
| सितंबर | 94 | 30 |
| अक्टूबर | 147 | 28 |
| नवंबर | 52 | 20 |
ऐसे ही एक मामले में परिजनों एम्स में काफी हंगामा मचाया था, मरीज अमित गौतम 25 साल को सर में तेज दर्द के कारण एम्स में भर्ती कराया गया था। परिजनों ने आरोप लगाया था कि, 6 घंटे बीत जाने के बाद भी अस्पताल में समय पर डॉक्टर इलाज के लिए नहीं पहुंचे, थे जिसके कारण परिजन मुसीबत में फंसे रहे। जहां पर मरीज को समय पर इलाज नहीं मिलने पर परिजनों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया है। इस दौरान परिजनों ने प्रबंधन पर आरोप लगाया कि, शाम 6 बजे तक कोई भी न्यूरो सर्जन डॉक्टर इलाज के लिए अस्पताल में नहीं है।
हंगामे का विडियो :
ऐसे ही कई मामले रोजाना एम्स में हो रहे है, जब हमारी टीम कैमरा लेकर एम्स पहुंची तो हमें अंदर नहीं जाने दिया गया। वहीँ नाम ना छपने की शर्त पर प्रबंधन के एक डॉक्टर ने बताया कि हम ईलाज करना भी चाहते है, लेकिन जूनियर डॉक्टरों के कारण, मरीज को रेफर भी करना पड़ता है, वहीँ ईलाज के लिये लोगों को कड़ी मशक्कत भी करनी पड़ती है। ऐसे ही एक मामला 5 सितम्बर को सामने आया था जिसमें एम्स के डॉक्टरों ने निजी अस्पताल का भी बकायदा डिस्चार्ज कार्ड में लिखा हुआ था, जो मरीज ने उपलब्ध करवाया था। ये सब एम्स प्रबंधन के नाक के नीचे हो रहा है। एम्स के डॉक्टरों का निजी अस्पताल से क्या कनेक्शन है, ये जांच का विषय है।
एक अन्य मामला :
महादेवघाट निवासी 52 वर्षीय धरम साहू को न्यूरो संबंधी समस्या थी। परिजनों ने उन्हें 2 सितंबर को एम्स में भर्ती कराया था। उन्हें इमरजेंसी विभाग में रखा गया। 3 सितंबर की सुबह बेड खाली नहीं होने का हवाला देते हुए डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज कर दिया। मरीज डिस्चार्ज न कर, दूसरे वार्ड में भेजने की गुहार लगाते रहे, लेकिन डॉक्टरों ने एक न सुनी। जबरिया डिस्चार्ज कार्ड भी बना दिया गया। इससे परिजन बड़ी मुश्किल में आ गये।
सितम्बर में ही एक और मामला भी सुर्ख़ियों में बना रहा :
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एम्स में ऑब्स एंड गायनी के डॉक्टरों ने एडवांस मशीन नहीं होने का हवाला देकर एक गर्भवती महिला को जांच के लिए समता कॉलोनी एक निजी अस्पताल भेज दिया। वहां मरीजों के 5 से 6 हजार रुपए खर्च हो गए। मरीजों को बताया गया कि वहां एडवांस मशीन है व अच्छी जांच होती है। महिला के गर्भ में जुड़वां बच्चे थे, लेकिन कंडीशन सही नहीं था। समता कॉलोनी में जांच के बाद महिला का ऑपरेशन एम्स में किया गया। इस तरह के कई मामले एम्स से सामने आ रहे है, वहीँ जबरदस्ती डिस्चार्ज करने वाले मरीज को एडमिट होने के लिये भी बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।
यश शर्मा की हालत है गंभीर :
बीते दो माह पहले चार आरोपियों ने यश शर्मा नामक युवक का अपहरण करके उसके साथ मारपीट की थी और खाली पेट शराब पिलाकर दो दिन तक भूखा भी रखा था, उसके साथ इतनी मारपीट की गई की उसकी अंदरूनी हालत बहुत ही गंभीर है, उसका बच पाना भी मुश्किल है, उसे भी एम्स के जिम्मेदारों ने मेकाहारा जाने के लिये कह दिया है। ऐसे में वह क्या करे परिवार में सेवा करने के लिये कोई नहीं है, अकेली माँ और इकलौता पीड़ित लड़का है, इलाज के लिये पैसे भी नहीं है।



