असाध्य रोगों से पीड़ित लोगों को इस राज्य में मिली ईच्छा मृत्यु की सुविधा….।

बेंगलूरु (कर्नाटक) : कई बार आम लोग कुछ ऐसी बीमारियों से ग्रसित होते है कि उनके मरना जीने से ज्यादा बेहतर हो जाता है, लेकिन भारतीय कानून के अनुसार आत्महत्या भी एक अपराध है, ऐसे यदि कोई आत्महत्या कर ले और बदकिस्मती से बच जाये तो ऐसे में उस व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (आत्महत्या करने की कोशिश) की धारा 309 के तहत दंड देने के बजाय, जुर्माना (भले ही ज्यादातर मामलों में यह एक टोकन राशि की क्यों न हो) या एक वर्ष तक के कारावास का प्रावधान किया गया है, जो कि क़ानूनी प्रक्रिया में फंस जाता है। ऐसे में कर्नाटक सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए गंभीर बीमारियों के उन मरीजों को गरिमापूर्ण मृत्यु चुनने का अधिकार दे दिया है, जिनके स्वास्थ्य में सुधार की संभावना नहीं रह गई है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी आदेश में कहा गया कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत किया गया है।

स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडूराव ने शुक्रवार को आदेश जारी करते हुए कहा कि इससे असाध्य बीमारियों से पीड़ित लोगों को सम्मानजनक मृत्यु मिल सकेगी। विभाग ने अग्रिम मेडिकल निर्देश (एएमडी) या लिविंग विल (जीवनकालीन वसीयत) दस्तावेज भी जारी किया है। इसमें मरीज भविष्य के उपचार के बारे में इच्छाएं दर्ज करा सकते हैं। यानी मरणासन्न होने या सहमति नहीं दे पाने की हालत में उनका इलाज कैसे हो, यह लिखा जा सकेगा। कोई भी स्वस्थ, मानसिक रूप से स्थिर वयस्क इच्छा मृत्यु की विल लिख सकता है। मरीज के पास निर्णय की क्षमता न होने पर वह अपनी ओर से निर्णय के लिए दो व्यक्तियों को नामित कर सकता है। कोई भी व्यक्ति इस बात पर सहमत नहीं है कि आत्महत्या के मुद्दे पर किसका नियंत्रण होना चाहिये और कम आत्महत्या वाला प्रयास कौन सा होता है? भारत में इच्छा-मृत्यु और दया मृत्यु दोनों ही अवैधानिक कृत्य हैं ये भारतीय दंड विधान (आईपीसी) की धारा 309 के अंतर्गत आत्महत्या का अपराध है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति प्रदान की है।

वहीँ विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेेख किया है, जिसमें पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण मृत्यु का वरण भी शामिल है। उल्लेखनीय है कि ऐसे ही एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक बयान जारी किया गया था, जिसमें न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया था कि इसमें कोई दोराय नहीं है कि संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को जीवन का अधिकार प्रदान किया गया है। परंतु, इसके साथ-साथ यह भी स्पष्ट कर देना अत्यंत आवश्यक है कि जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं होता है। हालाँकि, कुछ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों में जीवन के अधिकार के साथ-साथ इच्छामृत्यु के अधिकार को भी स्वीकार किया गया है।

पैसिव यूथेनेशिया के केस में ही इजाजत :

महामृत्युंजय मन्त्र उत्पत्ति की कथा और महत्व के साथ : https://www.youtube.com/watch?v=L0RW9wbV1fA

राज्य सरकार सुनिश्चित करेगी कि लिविंग विल की अनुमति केवल पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) के मामलों में ही दी जाए। एक्टिव यूथेनेशिया और पैसिव यूथेनेशिया, दोनों का प्रयोग इच्छा मृत्यु के लिए होता है। एक्टिव यूथेनेशिया में इच्छा मृत्यु मांगने वाले व्यक्ति को मृत्यु का चुनाव करने में मदद की जाती है। जैसे जहरीला इंजेक्शन लगाना या पेन किलर का ओवरडोज देना। दूसरी स्थिति में मरीज की जान बचाने के लिए कुछ नहीं करना है। इस तरह से राज्य सरकार ने अब यह नियम लागू किया है। पैसिव यूथेनेसिया का मतलब है रोगी गंभीर और न ठीक होने वाली बीमारी से जूझ रहा हो और अब उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो। ऐसे में उस शख्स को दिया जा रहा मेडिकल सपोर्ट हटा लिया गया हो, यही पैसिव यूथनेसिया कहलाता है।