रायपुर : मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य को बने 1 नवंबर 2025 को 25 साल पूरे हो गये है। छत्तीसगढ़ में राज्य स्थापना दिवस के मौके पर हर साल राज्योत्सव का आयोजन किया जाता है। इस बार राज्योत्सव के साथ अंतरराष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, विभिन्न आयोजन किये जा रहे है, इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी भी शिरकत कर रहे है। छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के दौरान नवा रायपुर में बड़ी संख्या में लोगों के आने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने विशेष ट्रैफिक और पार्किंग व्यवस्था की है। विभिन्न जिलों से आने वाले आगंतुकों के लिए निर्धारित मार्ग और पार्किंग स्थल तय किए गए हैं ताकि भीड़ और जाम की स्थिति न बने।
छत्तीसगढ़ के बारे में :
छत्तीसगढ़ भारत का एकमात्र राज्य है, जिसे ‘महतारी’ (माँ) का दर्जा प्राप्त है। जैसे भारत भूमि को भारत माता का दर्जा दिया गया है, वैसे ही छत्तीसगढ़ को “माँ” अर्थात महतारी छत्तीसगढ़ी भाषा में कहा जाता है। विभिन्न संस्कृतियों का केंद्र रहा छत्तीसगढ़ आज भी अपने प्राचीन मंदिरों के लिए पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है। प्राचीन भारत के दौर से ही भारत को गौरवान्वित करने के बाद आज भी छत्तीसगढ़ अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अस्तित्व में आया था। इस साल 2000 में जुलाई में लोकसभा और अगस्त में राज्यसभा में छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के प्रस्ताव पर मुहर लगी थी। जिसके बाद 4 सितंबर 2000 को भारत सरकार के राजपत्र में प्रकाशन के बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ देश के 26वें राज्य के रूप में दर्ज हो गया था। इस क्षेत्र की भाषा को छत्तीसगढ़ी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ी के अलावा भी राज्य में माढ़िया, हल्बी, गोंडी जैसी भाषा बोली जाती हैं। जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया गया था, उस समय केंद्र में स्व. अटल बिहारी वाजपेई की भाजपा की सरकार थी, जिन्होंने इसे राज्य का दर्जा देने का वादा किया था।
छत्तीसगढ़ नाम कैसे पड़ा?
छत्तीसगढ़ नाम के इर्द-गिर्द कई कहानियां प्रचलित हैं। यहाँ कहा जाता है कि करीब 300 साल पूर्व गोंड जनजाति के शासनकाल में यहाँ गोंड राजाओं के 36 किले थे, जिनके आधार पर इसे छत्तीसगढ़ नाम दिया गया। वहीँ कुछ इतिहासकारों के अनुसार कल्चुरी राजाओं द्वारा 36 किलों (शिवनाथ नदी के उत्तर में कलचुरियों की रतनपुर शाखा के 18 गढ़ और दक्षिण में रायपुर शाखा के 18 गढ़) को मिलाकर इसे छत्तीसगढ़ नाम दिया गया था। इससे पूर्व इस पूरे क्षेत्र को कौशल राज के नाम से जाना जाता था। इस तरह छत्तीसगढ़ का इतिहास रहा है।
रायपुर कैसे बना राजधानी :
छत्तीसगढ़ प्रदेश की राजधानी रायपुर का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। आज रायपुर दुनिया में आकर्षण का केन्द्र बन चुका है।छत्तीसगढ़ के गठन के बाद इसकी राजधानी को लेकर काफी विचार-विमर्श हुआ। पहले बिलासपुर को राजधानी बनाए जाने पर विचार किया गया, क्योंकि बिलासपुर वर्तमान राजधानी से उस समय पर ज्यादा विकसित था। लेकिन फिर काफी विचार के बाद रायपुर को छत्तीसगढ़ की राजधानी घोषित किया गया। इसकी राजधानी रायपुर – बिलासपुर रोड के बीच भी निर्माण करने का विचार हुआ था। अंततः नया रायपुर अटल नगर के रूप में विकसित किया गया।
छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर :
छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान सन् 1992 में पहली बार सामने आई थी। आंदोलनकारियों ने 4 भुजाओं वाली इसी महतारी के माथे पर रक्त तिलक लगाकर छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की सौगंध खाई थी। खून का वह टीका आज भी महतारी के माथे पर शोभायमान है। अभी सरकारी दफ्तरों से लेकर तमाम बड़े कार्यक्रमों में हम महतारी की जो तस्वीर देखते हैं, उसमें भी 30 साल पुरानी उसी पेंटिंग का पुट नजर आता है। छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर बनने की कहानी। इसमें धीरे – धीरे बदलाव किया गया।
प्रदेश के सभी बड़े आंदोलनिकारियों के खून से शोभायमान मां का माथा :
1996 में ही 27 दिसंबर को बिलासपुर के नेहरू चौक में राज्य निर्माण आंदोलनकारियों का बड़ा जलसा हुआ था। तब मंच पर रखने के लिए छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर को रायपुर से बिलासपुर ले जाया गया था। इसी दौरान डॉ. केयूर भूषण, डॉ प्रभात मिश्रा, हरि ठाकुर, पुरुषोत्तम लाल कौशिक, नंदकिशोर पांडेय जैसे बड़े आंदोलनकारियों ने छत्तीसगढ़ महतारी के माथे पर अपने रक्त का तिलक लगाकर कसम खाई थी कि छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाकर ही दम लेंगे। आंदोलनकारियों का वह खून आज तक 29 साल बाद भी महतारी के माथे पर शोभायमान है। इस तस्वीर में माता के हाथों में धान और हंसिया के अलावा नांगर और त्रिशूल भी नजर आता है। इसके जरिए कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ के साथ यहां माता के प्रति लोगों की अनन्य भक्ति को दर्शाने का प्रयास किया गया है। इसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
मां दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती को मिलाकर दिया था रूप :
छत्तीसगढ़ महतारी की पहली तस्वीर सन् 1992 में ललित मिश्रा ने बनाई थी। तब वे राज्य निर्माण के लिए बतौर छात्र नेता आंदोलन कर रहे थे। उन्होंने आजाद छत्तीसगढ़ फौज का भी गठन किया था। छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर जब वे लोगों के बीच पहुंचे तो महसूस किया कि जनता के बीच छत्तीसगढ़ को जीवंत ढंग से प्रस्तुत करने की जरूरत है, ताकि लोगों का इस आंदोलन से भावनात्मक लगाव हो। यहीं से उन्हें पहली बार छत्तीसगढ़ महतारी की पेंटिंग बनाने का ख्याल आया था। रायपुर में वे गोलबाजार से माता लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती की तस्वीर लेकर आ गए। फिर इन्हीं तीनों को तस्वीरों को देखकर उन्होंने 5 दिन में ऑइल पेंट पर छत्तीसगढ़ महतारी की पहली तस्वीर को उकेरा गया था।
1996 में इसी पेंटिंग के बैनरतले बंद, रोकी रेल :
इसके साथ ही राज्य निर्माण के लिए रायपुर से लेकर दिल्ली तक कई आंदोलन हुए। लेकिन, 11 मार्च 1996 के आंदोलन को दशकों बाद भी याद रखा जायेगा। दरअसल, राज्य आंदोलनकारियों ने इस दिन 16 जिलों में महाबंद, आर्थिक नाकेबंदी और रेल रोको आंदोलन का शंखनाद किया था। यह आंदोलन मिश्रा द्वारा रचित छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर के बैनर तले ही हुआ था। इस आंदोलन को दशकों बाद भी याद रखा जाएगा। इस आंदोलन की आग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रायपुर के तत्कालीन एसपी रूस्तम सिंह ने आंदोलनकारियों को रेलवे स्टेशन या रेल पटरी पर देखते ही गोली मारने के आदेश तक दे दिए थे, इसके कारण आन्दोलन की आग बड़े स्तर तक भड़क सकती थी। हालांकि, ऐसी कोई घटना नहीं हुई। हजारों आंदोलनकारियों को गिरफ्तार जरूर किया गया था।
आज जिस तस्वीर का इस्तेमाल हो रहा, वह 2017 में फोटोशॉप पर बनी :
आज सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ महतारी की जिस तस्वीर का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसे 2017-18 में फोटोशॉप के जरिए तैयार किया गया है। इसे कवि ईश्वर साहू बंधी ने तैयार किया है। इस तस्वीर बनाने की कहानी बताते हुए वे कहते हैं कि वे छत्तीसगढ़ी को भाषा का दर्जा देने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि सोशल मीडिया पर अपने आंदोलन को बेहतर ढंग से लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्हें छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर की जरूरत है। गूगल पर सर्च किया पर कुछ मिला नहीं तो उन्होंने कुछ ग्राफिक्स डिजाइनर्स से संपर्क किया। बेहतर प्रतिसाद नहीं मिलने पर उन्होंने खुद ही फोटोशॉप के जरिए नई तस्वीर बनाई। यह इतना वायरल हुआ कि सरकार ने इसे ही छत्तीसगढ़ महतारी के रूप में स्वीकार कर लिया। जो आज तक चल रहा है और इस मूर्ति को राज्य के हर निवासी सिन्धी, मारवाड़ी, जैन, अग्रवाल, ब्राम्हण, सिक्ख सभी समाजों ने बड़े ही आदर से स्वीकार कर लिया।



