गरियाबंद : महंगा होता इलाज और आय कमी, ऊपर गरीबी की बड़ी लाचारी, किसी को जीने नहीं देती है, वहीँ डॉक्टरों की खोती हुई इंसानियत, आम आदमी की जिन्दगी हर तरह से दूभर होती ही जा रही है। मामला है भुंजिया जनजाति की 23 वर्षीय गर्भवती महिला को नॉर्मल डिलीवरी के एवज में अस्पताल ने 20 हजार रुपए की मांग की थी, जब तक बेवा सास पैसों का प्रबंध करती, तब तक महिला को नवजात के साथ अस्पताल में कथित तौर पर बंधक बनाकर रखा गया था, आखिरकार जिला पंचायत अध्यक्ष के अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अस्पताल प्रबंधन से चर्चा के बाद जच्चा-बच्चा सकुशल घर पहुंचे। तब तक आदिवासी महिला और उसका बच्चा अस्पताल में बंधक बने हुये थे।
मामला है आदिवासी ब्लॉक मैनपुर के मूचबहल के मालिपारा वार्ड में रहने वाली भुंजिया जनजाति की 23 साल की नवीना चींदा, जिसे प्रसव के बाद ओड़िशा के कालाहांडी जिले के धर्मगढ़ स्थित एक निजी अस्पताल में पांच दिनों तक अघोषित रूप से बंधक बनाकर रखा गया था, जिसको लेकर प्रसूता की सास दोषो बाई ने बताया कि 18 तारीख को प्रसव पीड़ा के बाद उसे धर्मगढ़ स्थित मां भंडारणी क्लिनिक में भर्ती कराया गया था, उसी दिन ही सामान्य प्रसव में पोती ने जन्म दिया। वहीँ भर्ती से पहले 5 हजार जमा किया गया था, लेकिन प्रसव के बाद अस्पताल प्रबंधन ने और 15 हजार रुपए की मांग की।
इसके साथ ही पैसे पूरे देने के बाद ही बहू, 3 साल के पोते और नवजात को लाना संभव था। इसलिये पैसे की व्यवस्था करने के लिए वह 21 जनवरी को गांव वापस आ गई। वहीँ सास ने बताया कि बेटा पोड़ा आंध्र के ईंट भट्ठे में मजदूरी करता है। उसको भी फोन लगाया गया था, पर उसके सेठ भी पैसा नहीं दे रहे थे। बेटे के साथ रही बहू 6 माह के गर्भ के दौरान घर वापस आ गई थी, जो यहाँ रह रही थी।
ऑपरेशन से हुआ था पहला बच्चा :
इसको लेकर सास ने बताया कि पहला बच्चा तीन साल पहले धर्मगढ़ के उसी अस्पताल में ऑपरेशन से हुआ था। तब सोना-चांदी बेच कर 85 हजार रूपये दिया था। वहीँ इस बार प्रसव पीड़ा के बाद स्थानीय अस्पताल को मैंने संपर्क नहीं किया, क्योंकि पिछली बार वे इंकार कर दिए थे। जिसके बाद दोबारा बहू की स्थिति को देखते हुए गाड़ी किराया कर ओड़िशा ले गई, लेकिन सामान्य ऑपरेशन के बाद भी इतनी रकम मांगी गई कि छह दिन तक इंतजाम नहीं हो पाया। जिसके बाद जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर की मदद से जच्चा-बच्चा सकुशल घर पहुंचे।
सरकारी योजना से वंचित परिवार :
2000 की आबादी वाले गांव में पोशो चींदा का परिवार अकेला भुंजिया है। यहाँ गांव के बीच में टूटे हुए मकान में सास और बहू रहते हैं। यहाँ रोजगार का अभाव था इसलिए बेटा आंध्रप्रदेश में काम करने जाता है। गांव कलस्टर में शामिल नहीं इसलिए विशेष पिछड़े जनजाति योजना का लाभ इस परिवार को नहीं मिल रहा है, वहीँ प्रधानमंत्री आवास के तहत आवास मिला है, पर बना नहीं पा रहे हैं। बूढ़ी सास मजदूरी करके किसी तरह बड़ी मुश्किल से गुजारा कर रही है। यहाँ परिवार के लिए मजदूरी ही अंतिम विकल्प था।
मदद के लिए भेजा प्रतिनिधि :
जिला पंचायत अध्यक्ष गौरी शंकर कश्यप ने बताया कि लाचार सास दो दिन से पैसों की व्यवस्था में जुटी हुई थी, कारण सुनते ही हैरानी हुई, लेकिन पहले अस्पताल में मौजूद जच्चा-बच्चा को सकुशल वापस लाना था। वहीँ अस्पताल में प्रतिनिधि के तौर पर मैने दो लोगों को भेजा था। जिसके बाद मसला समझने के बाद उसे सकुशल वापस लेकर आए, लेकिन ऐसी परिस्थिति क्यों निर्मित हो रही है, सरकारी योजना का लाभ भुंजिया जनजाति की महिला तक क्यों नहीं पहुंचा, लापरवाही किसकी थी, इस संबंध में जांच के लिए सीएमएचओ को निर्देशित किया जायेगा। यह काफी दुखद मामला है।
स्वेच्छा से बिल भरने को कहा :
वहीँ मौके पर गए जय विलास शर्मा ने बताया कि अस्पताल पहुंचने के बाद प्रबंधन ने 2 घंटे इंतजार कराया और फिर अस्पताल में मौजूद कालाहांडी जिला पंचायत सदस्य गोपीनाथ महानंद ने मदद की। शेष 15 हजार रुपए की बजाए स्वेच्छा से बिल भरने कहा गया। वहीँ इस पर गौरी शंकर कश्यप के माध्यम से 5 हजार दिया गया, जिसके बाद एंबुलेंस के जरिए जच्चा-बच्चा को उसके गांव सकुशल छोड़ा गया। इस तरह माँ और बच्चा घर पहुँच पाये।
अस्पताल संचालक ने दी सफाई :
इस मामले में अस्पताल संचालक चैतन्य मेहेर ने सफाई देते हुए कहा है कि उन्होंने किसी भी प्रकार से पैसों की मांग नहीं की थी। वहीँ महिला और उनके परिजनों ने हमें दिक्कतों की कोई जानकारी नहीं दी थी। जब तक रही तब तक स्टाफ ने उनका पूरा ख्याल रखा है। अगर वे रुपए की दिक्कत बताते तो उन्हें पहले ही जाने दे दिए होते, पर उन्होंने अंतिम समय तक कुछ भी नहीं बताया गया है।



