सुकमा : केंद्र सरकार द्वारा नक्सल उन्मूलन अभियान लगातार चलाने के बाद 40 सालों तक नक्सलवाद की समस्या झेलने के बाद छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 31 मार्च 2026 को को बदलाव की एक ऐतिहासिक सुबह हुई है। सुकमा को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया, यह 1980 के दशक से चले आ रहे भय, हिंसा और संघर्ष के अंत का प्रतीक है। यह उपलब्धि सुरक्षा बलों की सतत कार्यवाही, प्रशासनिक समन्वय और स्थानीय आदिवासी समुदाय के सहयोग का संयुक्त परिणाम है। इस लंबी लड़ाई में सबसे बड़ी कीमत निर्दोष ग्रामीणों ने चुकाई है। पिछले चार दशकों में माओवादी हिंसा में 398 नागरिकों की मौत हुई, जबकि करीब 144 लोग गंभीर रूप से घायल हुये। कई घटनायें सामने आई जो छत्तीसगढ़ के सीने पर गहरे घाव देकर गई।
1989 से शुरू हुआ खून-खराबे का सिलसिला :
सुकमा में नक्सली हिंसा की पहली घटना 13 फरवरी 1989 को रामाराम गांव में हुई थी, जब नक्सलियों ने तत्कालीन सरपंच और विधायक के घर से बंदूकें लूटी थीं। इसके बाद हत्याओं, IED विस्फोटों, अपहरण और हमलों का सिलसिला लगातार जारी रहा, जो अब तक चलता आ रहा था। वहीँ कई ग्रामीणों को मुखबिरी के शक में बेरहमी से मारा गया, पत्रकारों, शिक्षादूतों और यहां तक कि बच्चों को भी निशाना बनाया गया। कई बड़े हमलों में दर्जनों लोगों की जान गई। साल 2006 का एर्राबोर हमला और साल 2010 में यात्री बस को IED से उड़ाना आज भी क्षेत्र की दर्दनाक यादों में शामिल हैं। झीरम का दर्द भी काफी चर्चित रहा है।
विकास को रोकने की साजिश, डर का साम्राज्य :
नक्सलियों ने विकास कार्यों को भी बाधित किया गया और वह सड़कों का निर्माण रोका गया, सरकारी भवनों, स्कूलों को नुकसान पहुंचाया गया और पूरे क्षेत्र में भय का माहौल बनाया गया। सुरक्षा बलों की मजबूत उपस्थिति और प्रभावी नक्सल विरोधी अभियानों ने प्रभावित क्षेत्रों के हालात बदल दिये, इसके साथ ही जिन क्षेत्रों में कभी बारूदी सुरंगों का खतरा रहता था, वहां अब आम नागरिक निर्भय होकर आवाजाही कर रहे हैं। सड़क, पुल, मोबाइल नेटवर्क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। अब सुकमा विकास की राह पर अग्रसर हो गया है, ग्रामीणों का विश्वास बढ़ा है और शासन की योजनाएं अब अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही हैं।
बलिदान को समर्पित यह जीत :
जिला पुलिस ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि को उन सभी निर्दोष आदिवासियों और शहीद जवानों को समर्पित किया है, जिन्होंने इस संघर्ष में अपने प्राणों की आहुति दी। सुकमा की यह सफलता सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि उस संकल्प की मिसाल है जिसमें आतंक के खिलाफ लड़ाई जीतकर विकास की नई सुबह लिखी गई है। अब जाकर इस लाल आतंक का खात्मा हुआ है।



