जांजगीर-चांपा : कानून-व्यवस्था के संधारण, अपराधियों पर नियंत्रण और जनसुरक्षा के लिए जिन पुलिसकर्मियों के हाथों में हथियार तथा संवेदनशील दायित्व सौंपे जाते हैं, उनसे रक्षित केंद्र के भीतर झाड़ू लगवाने और शौचालय की सफाई कराने का एक अत्यंत गंभीर मामला प्रकाश में आया है। जांजगीर-चांपा जिले के रक्षित केंद्र (पुलिस लाइन) से संबंधित दो अलग-अलग वीडियो ऑनलाईन प्लेटफॉर्मों और सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे हैं, जिन्होंने खाकी वर्दी की गरिमा और पुलिस विभाग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोबाईल कैमरों से रिकॉर्ड किए गए इन वीडियो फुटेज में पूर्ण वर्दी में तैनात महिला आरक्षक झाड़ू लगाकर रक्षित निरीक्षक (आरआई) के कक्ष से संलग्न प्रसाधन कक्ष (बाथरूम) की सफाई करती स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं। इस घटनाक्रम के सार्वजनिक होते ही पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
रक्षित निरीक्षक पर अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप, निष्पक्ष जांच की मांग :
वायरल वीडियो के आधार पर रक्षित केंद्र जांजगीर के रक्षित निरीक्षक प्रदीप जोशी के विरुद्ध अधिकारों के दुरुपयोग और अधिनस्थ आरक्षकों से नियमित पुलिस कर्तव्यों के स्थान पर निजी व चतुर्थ श्रेणी सफाई कर्मचारियों का कार्य कराने के सीधे आरोप लगे हैं। मामले को गंभीरता से लेते हुए ‘संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ’ ने मोर्चा खोल दिया है। संघ ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों एवं पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से मांग की है कि मामले की निष्पक्षता से जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर विभागीय एवं दंडात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। संघ का स्पष्ट कहना है कि प्रशिक्षित बल का इस प्रकार मानमर्दन न केवल पुलिस बल के मनोबल को चोट पहुंचाता है, बल्कि सेवा शर्तों का खुला उल्लंघन भी है।
निर्धारित सफाई कर्मियों की जगह सीनियर आरक्षकों से सेवा कार्य कराने पर रोष :
शिकायत में यह गंभीर तथ्य रेखांकित किया गया है कि रक्षित केंद्र और शासकीय कार्यालयों की स्वच्छता के लिए शासन स्तर से पृथक सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था और बजट आवंटित होता है। इसके बावजूद, नियमित विधि-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण और सुरक्षा दायित्वों के लिए भर्ती किए गए सीनियर आरक्षकों से कथित तौर पर झाड़ू और पोछा लगवाया जा रहा है। सबसे अधिक आपत्तिजनक पहलू यह है कि महिला पुलिसकर्मियों को ड्यूटी की आधिकारिक वर्दी पहने हुए ही शौचालय धोने के काम में झोंक दिया गया। इस स्थिति ने पुलिस प्रशिक्षण, मानव गरिमा और बल के अंदर आंतरिक श्रम-शोषण पर व्यापक बहस छेड़ दी है।
कार्य से इंकार करने पर गैर-हाजिरी और निलंबन का भय दिखाने का आरोप :
संगठन द्वारा प्रस्तुत ज्ञापन में रक्षित निरीक्षक की कार्यशैली को लेकर एक और चौंकाने वाला आरोप सामने आया है। आरोप के मुताबिक, जो पुलिसकर्मी या महिला आरक्षक इस प्रकार के अशोभनीय कार्य को करने से साफ इंकार करते हैं, उन्हें प्रशासनिक प्रताड़ना का शिकार बनाया जाता है। उनके विरुद्ध कथित रूप से अनुशासनहीनता, अवज्ञा और अनुपस्थिति (गैर-हाजिरी) की रपट डाल दी जाती है।
इतना ही नहीं, पुलिसकर्मियों की औपचारिक आमद (रोल कॉल में उपस्थिति दर्ज करना) रोकने की धमकी दी जाती है। शिकायत के अनुसार, संबंधित अधिकारी द्वारा कथित तौर पर यह फरमान सुनाया जाता है कि जब तक सौंपे गए सफाई कार्य का निरीक्षण नहीं हो जाता, तब तक कार्मिकों की आमद स्वीकार नहीं की जायेगी। पुलिस संगठन का सवाल है कि यदि कोई कर्मचारी अपनी गरिमा के विरुद्ध जाकर गैर-कानूनी आदेशों की तामील से इंकार करता है, तो उसके विरुद्ध ऐसी दंडात्मक कार्यवाही दर्ज करने का विधिक आधार आखिर क्या है?
सीसीटीवी फुटेज की फोरेंसिक जांच और साक्ष्य सार्वजनिक करने की मांग :
‘संयुक्त पुलिस कर्मचारी एवं परिवार कल्याण संघ’ के प्रदेश अध्यक्ष उज्जवल दीवान ने उच्चाधिकारियों से आग्रह किया है कि पूरे प्रकरण की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए रक्षित केंद्र जांजगीर के सभी सीसीटीवी कैमरों के फुटेज की तकनीकी जांच कराई जाए। संघ का कहना है कि:
- सीसीटीवी फुटेज के सूक्ष्म विश्लेषण से यह आधिकारिक रूप से स्पष्ट हो सकेगा कि वीडियो में दिख रही महिला आरक्षक कौन हैं।
- किस सक्षम अधिकारी के मौखिक अथवा लिखित निर्देश पर उन्हें फील्ड ड्यूटी से हटाकर इस कार्य में लगाया गया था।
- यह भी प्रमाणित होना आवश्यक है कि किन-किन आरक्षकों की आमद रोकी गई है और किन परिस्थितियों में उन्हें गैर-हाजिर दिखाकर उनके सेवा अभिलेख को दूषित करने का प्रयास किया गया।
यदि तथ्यों में छेड़छाड़ अथवा दबाव बनाने का प्रयास पाया जाता है, तो साक्ष्यों को नष्ट करने के संबंध में संबंधितों पर कानूनी मुकद्दमा कायम कर विधिक कार्यवाही की जानी चाहिए।
डीजीपी को पूर्व प्रेषित ज्ञापनों पर अपेक्षित कार्यवाही न होने पर नाराजगी :
उज्जवल दीवान ने बताया कि संगठन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम और रक्षित केंद्र में पदस्थ कर्मचारियों की पीड़ा को लेकर पुलिस महानिदेशक को पहले ही लिखित पत्र सौंपा जा चुका है। पत्र में मांग की गई थी कि जिन पुलिसकर्मियों की आमद रोकी गई है, उन्हें तत्काल प्रभाव से सेवा में दर्ज किया जाए और विभागीय शोषण पर रोक लगाई जाए।
परंतु लंबा समय बीतने के बाद भी जब कोई ठोस कार्यवाही धरातल पर नहीं दिखी, तो असंतोष और अधिक गहरा गया। संघ का कहना है कि न केवल जांजगीर-चांपा बल्कि राज्य के किसी भी अन्य क्षेत्र में वर्दीधारियों के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। सुरक्षाबलों का मनोबल टूटने से पूरे क्षेत्र की प्रशासनिक मशीनरी ठप्प हो सकती है, जिसका विपरीत प्रभाव नागरिक सुरक्षा पर पड़ना स्वाभाविक है।
निलंबन की तत्काल मांग, आंदोलन का अल्टीमेटम :
कर्मचारी संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि रक्षित निरीक्षक प्रदीप जोशी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर विभागीय जांच आयोग का गठन नहीं किया गया, तो पुलिस परिवार लोकतांत्रिक तरीके से सड़कों पर उतरने को बाध्य होगा। संघ ने चेताया कि यदि निष्पक्ष जांच के नाम पर लीपापोती की जायेगी, तो इस प्रकरण को अंतर्राज्यीय स्तर पर मानवाधिकार आयोग और उच्च न्यायालय के समक्ष भी ले जाया जायेगा।
वर्तमान में वीडियो के व्यापक प्रसार के बाद जिला पुलिस प्रशासन और गृह विभाग में उच्च स्तर पर विचार-विमर्श तेज हो गया है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि तथ्यों का संज्ञान लिया जा रहा है और जांच रिपोर्ट प्रस्तुत होने के उपरांत ही आगे की विधिसम्मत कार्यवाही अमल में लाई जायेगी।



