कोयला घोटाले में 9500 पेज का एक और चालान पेश, सामने आया घोटाले का तरीका, देवेंद्र यादव सहित 12 लोग आरोपी।

रायपुर : छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक के कोयला लेवी घोटाले में आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने विशेष अदालत के समक्ष साढ़े नौ हजार पन्नों का विस्तृत पूरक चालान पेश कर दिया है। अदालत में दाखिल इस वृहद दस्तावेज में घोटाले की पूरी आपराधिक कार्यप्रणाली, आरोपियों के सिंडिकेट, अवैध उगाही के सुनियोजित प्रवाह और अरबों रुपयों के काले धन को सफेद करने के लिए रची गई जटिल वित्तीय संरचना का परत-दर-परत खुलासा किया गया है। जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि किस प्रकार सत्ता और प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत से समानांतर व्यवस्था खड़ी कर खनिजों के परिवहन पर अवैध शुल्क थोपा गया। हालांकि, चालान पेश किए जाने के दौरान सभी नामजद आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होना था, किंतु कोई भी आरोपी पेशी के समय उपस्थित नहीं हुआ।

इन रसूखदारों के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज, चालान में नाम शामिल :

ईओडब्ल्यू-एसीबी द्वारा विशेष न्यायालय में जिन प्रमुख लोगों के विरुद्ध पूरक चालान पेश किया गया है, उनमें राजनीतिक, प्रशासनिक और कारोबारी रसूख से जुड़े कई बड़े चेहरे शामिल हैं:

  • रामगोपाल अग्रवाल (छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व कोषाध्यक्ष एवं नागरिक आपूर्ति निगम के पूर्व अध्यक्ष)
  • देवेंद्र सिंह यादव (विधायक, भिलाई नगर)
  • विनोद तिवारी (राजनीतिक पदाधिकारी/कार्यकर्ता)
  • रामप्रताप सिंह उर्फ आर.पी. सिंह (वरिष्ठ राजनीतिक पदाधिकारी)
  • चंद्रदेव प्रसाद राय (पूर्व विधायक, बिलाईगढ़)
  • जयप्रकाश मौर्य (तत्कालीन संचालक, भौमिकी एवं खनिकर्म संचालनालय)
  • पीयूष कुमार साहू (निलंबित आईएएस रानू साहू के भाई)
  • जोगेंदर सिंह (कारोबारी एवं मुख्य सिंडिकेट सहयोगी)
  • अनुराग चौरसिया (निलंबित उपसचिव सौम्या चौरसिया के पारिवारिक सदस्य)
  • दीपेश टांक (रियल एस्टेट एवं वित्तीय सहयोगी)
  • सुनील कुमार अग्रवाल (इंद्रमणि समूह के संचालक)
  • राहुल मिश्रा (परियोजना एवं नकदी प्रबंधक)

इन सभी आरोपियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र), 420 (धोखाधड़ी), 384 (जबरन वसूली), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी), 468, 471 तथा 109 के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 (यथा संशोधित 2018) की विभिन्न सुसंगत धाराओं के तहत मुकद्दमा दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाया गया है। जांच एजेंसी इससे पूर्व इस प्रकरण में एक मुख्य चालान और पांच पूरक चालान दाखिल कर चुकी है।

कोयला ही नहीं, लौह अयस्क पैलेट परिवहन से भी 100 रुपए प्रति टन की वसूली :

जांच एजेंसी की विवेचना में यह सनसनीखेज तथ्य स्थापित हुआ है कि अवैध उगाही का दायरा केवल कोयले तक सीमित नहीं था, बल्कि औद्योगिक क्षेत्र में लौह अयस्क पैलेट के परिवहन पर भी 100 रुपए प्रति टन की दर से अवैध वसूली की जा रही थी।

  • नीतिगत बदलाव का षड्यंत्र: लौह अयस्क एवं पैलेट के सुगम परिवहन पर रोक लगाने और उसे जबरन अभिवहन पास (ट्रांजिट पास) की व्यवस्था के दायरे में लाने का प्रस्ताव 14 दिसंबर 2021 को संचालनालय से शासन को प्रेषित किया गया था।
  • आदेश का क्रियान्वयन: 5 जनवरी 2022 को जारी शासकीय आदेश के जरिए सड़क एवं रेल दोनों मार्गों से होने वाले माल परिवहन के लिए यह जटिल प्रणाली अनिवार्य कर दी गई।
  • अधिकारियों की मिलीभगत: विवेचना के अनुसार, तत्कालीन संचालक (भौमिकी एवं खनिकर्म) जयप्रकाश मौर्य ने बाकायदा पैलेट उद्योगपतियों की बैठक बुलाई। इस बैठक में उद्योगपतियों को दो-टूक निर्देश दिए गए कि वे खनिज परिवहन को निर्बाध रखने के लिए 100 रुपए प्रति टन की निर्धारित राशि मुख्य सरगना सूर्यकांत तिवारी अथवा उसके अधिकृत एजेंटों को अनिवार्य रूप से सौंपें।
  • पुख्ता साक्ष्य: पैलेट उद्योग से वसूल की गई करोड़ों रुपयों की प्रविष्टियां जांच दल द्वारा जब्त की गई निजी डायरियों और डिजिटल बहीखातों में दर्ज पाई गई हैं। विभागीय स्तर पर हुई इस सांठगांठ और तत्कालीन संचालक की संलिप्तता का विस्तृत लेखा-जोखा चालान का मुख्य आधार बनाया गया है।

ऑनलाईन व्यवस्था पर अंकुश लगाकर सूर्यकांत तिवारी ने बनाया वसूली का समानांतर नेटवर्क :

विवेचना के अनुसार, किंगपिन सूर्यकांत तिवारी ने शासन के शीर्ष अधिकारियों और अपने सहयोगियों के साथ सांठगांठ कर पूरे राज्य के कोल कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों से 25 रुपए प्रति टन की दर से खुली अवैध वसूली का तंत्र स्थापित किया था:

  • ऑनलाईन प्रणाली में जानबूझकर अड़ंगा: पारदर्शी खनिज परिवहन को बाधित करने के लिए 15 जुलाई 2020 को एक विशेष आदेश जारी कराया गया। इसके तहत खनिज की निकासी के लिए ऑनलाईन ई-परमिट जारी होने से पहले संबंधित जिला खनिज अधिकारी (डीएमओ) का मैन्युअल भौतिक अनुमोदन अनिवार्य कर दिया गया।
  • परिवहन व्यवस्था ठप्प करने की धमकी: यदि किसी व्यवसायी या कोल लिफ्टर ने 25 रुपए प्रति टन का निर्धारित कमीशन देने से इंकार किया, तो उसका ऑनलाईन अप्रूवल रोक दिया जाता था, जिससे खदानों से कोयले की उठाई और आपूर्ति पूरी तरह ठप्प हो जाती थी।
  • रायपुर में केंद्रीय लेखा तंत्र: राज्य के समस्त कोयला खनन क्षेत्रों से वसूली गई करोड़ों रुपए की नकदी सुरक्षित वाहनों के जरिए राजधानी रायपुर पहुंचाई जाती थी। रायपुर स्थित मुख्य कार्यालय में इस रकम का बाकायदा हिसाब रखा जाता था और फिर शीर्ष स्तर पर उसका वितरण सुनिश्चित किया जाता था।

डिजिटल साक्ष्य, ईमेल और वीआईपी प्रोटोकॉल से उजागर हुआ सिंडिकेट :

जांच एजेंसी ने साढ़े नौ हजार पन्नों के इस पूरक चालान में वैज्ञानिक, फॉरेंसिक और डिजिटल साक्ष्यों की एक अटूट श्रृंखला प्रस्तुत की है:

  • विश्राम गृहों में सीएम हाउस के नाम पर वीआईपी सुविधाएं: सूर्यकांत तिवारी और उसके प्रमुख सिंडिकेट सदस्य जब वसूली तंत्र की समीक्षा करने और खनिज अधिकारियों पर दबाव बनाने विभिन्न जिलों के दौरे पर जाते थे, तब उनके ठहरने के लिए संबंधित क्षेत्र के सरकारी सर्किट हाउस एवं विश्राम गृहों में ‘सीएम हाउस’ के हवाले से वीआईपी कमरे आरक्षित कराए जाते थे।
  • कॉरपोरेट पत्राचार और ईमेल: विवेचना के दौरान दिग्गज औद्योगिक कंपनी बालको (BALCO) का वह आधिकारिक ईमेल और पत्राचार बरामद किया गया, जिसमें स्पष्ट दर्ज है कि अवैध लेवी के भुगतान के कारण परिवहन बिलों में 25 रुपए प्रति टन की अतिरिक्त राशि को ‘इंसीडेंटल एक्सपेंसेस’ (आकस्मिक व्यय) के रूप में जोड़ा गया था।
  • कंपनियों की विवशता: इसी प्रकार अंबुजा सीमेंट द्वारा खनिज विभाग को भेजे गए पत्राचार को भी जब्त किया गया है, जिसमें टीपी पास रोके जाने और आपूर्ति बाधित होने के संबंध में विभाग से गुहार लगाई गई थी।
  • राजनीतिक उपयोग और चुनावी फंडिंग: जांच में स्थापित हुआ है कि उगाही गई अकूत राशि का बड़ा हिस्सा नियमित चुनावी चंदे, राजनीतिक रैलियों के प्रबंधन और खैरागढ़ विधानसभा उपचुनाव में पानी की तरह बहाया गया था।

चालान में दर्ज आरोपियों की व्यक्तिगत भूमिका और वित्तीय संलिप्तता :

विशेष अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, सिंडिकेट से जुड़े प्रत्येक आरोपी की भूमिका, उन्हें प्राप्त हुई अवैध राशि और संपत्तियों में उसके निवेश का ब्योरा इस प्रकार है:

रामगोपाल अग्रवाल :

प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष एवं नागरिक आपूर्ति निगम के तत्कालीन अध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल के सिंडिकेट से सीधे वित्तीय तार जुड़े थे। जब्त डायरियों में कोड वर्ड “भवन” एवं “सी पार्टी” के नाम से दर्ज 32 प्रविष्टियों में कुल 104.20 करोड़ रुपए का लेन-देन प्रमाणित हुआ है। विवेचना में सामने आया कि यह राशि राजीव भवन तक पहुंचाई जाती थी और देवेंद्र डडसेना के माध्यम से पार्टी फंड व अन्य व्यवस्थाओं के नाम पर रामगोपाल अग्रवाल इसे प्राप्त करते थे। इस काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा उनके पारिवारिक सदस्यों से संबंधित कंपनियों के माध्यम से जमीन की खरीद, बेनामी परिसंपत्तियों और रजिस्ट्री मूल्य से इतर भारी नकद भुगतान में खपाया गया।

देवेंद्र यादव :

भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव और उनके निकट सहयोगी नवाज के संदर्भ में जब्त डायरियों की 11 प्रविष्टियों से कुल तीन करोड़ रुपए की प्राप्ति दर्ज पाई गई है। इस राशि का बड़ा हिस्सा खैरागढ़ उपचुनाव के दौरान राजनीतिक खर्चों, प्रचार तंत्र और व्यक्तिगत उपयोग के लिए सीधे सूर्यकांत तिवारी के सिंडिकेट से हासिल किया गया था।

विनोद तिवारी :

राजनीतिक कार्यकर्ता विनोद तिवारी के नाम अथवा उनके छद्म संदर्भों से जुड़ी 22 डायरी प्रविष्टियों में कुल 2,12,11,000 रुपए (दो करोड़ बारह लाख ग्यारह हजार रुपए) का लेन-देन उजागर हुआ है। विवेचना के अनुसार, सूर्यकांत तिवारी से प्राप्त इस नकदी का उपयोग खैरागढ़ उपचुनाव में वृहद प्रचार होर्डिंग्स के भुगतान, जिला पंचायत पदाधिकारियों एवं सदस्यों के प्रबंधन तथा अन्य राजनीतिक आयोजनों में किया गया।

रामप्रताप सिंह (आर.पी. सिंह) :

जब्त डायरियों में “आरपी सिंह” एवं “आरपी” के नाम से दर्ज 25 प्रविष्टियों के तहत कुल 2.93 करोड़ रुपए का हिसाब मिला है। जांच में स्पष्ट हुआ कि सूर्यकांत तिवारी से प्राप्त इस नकदी का उपयोग उन्होंने अपने व्यक्तिगत खर्चों के साथ-साथ मीडिया प्रबंधन, राजनीतिक गतिविधियों और लक्जरी वाहनों के काफिले के संचालन में किया।

चंद्रदेव प्रसाद राय :

बिलाईगढ़ के तत्कालीन विधायक चंद्रदेव प्रसाद राय से जुड़ी चार डायरी प्रविष्टियों में कुल 49.50 लाख रुपए का उल्लेख मिला है। यह राशि सूर्यकांत तिवारी से सीधे प्राप्त कर चुनाव संबंधी गतिविधियों में व्यय की गई थी। इसके अतिरिक्त, चालान में यह भी उल्लिखित है कि सिंडिकेट के सरगना द्वारा उन्हें लाखों रुपए मूल्य के बहुमूल्य स्वर्ण एवं रत्न आभूषण भी भेंट किए गए थे।

जयप्रकाश मौर्य (तत्कालीन संचालक, खनिज) :

आईएएस अधिकारी जयप्रकाश मौर्य से संबंधित दो डायरी प्रविष्टियों में कुल एक करोड़ रुपये की अवैध नकदी प्राप्ति दर्ज है। संचालक भौमिकी एवं खनिकर्म के पद पर रहते हुए उन्होंने सूर्यकांत तिवारी के साथ निरंतर विभागीय समन्वय बनाए रखा, अवैध वसूली के अनुकूल नियम गढ़े और पैलेट उद्योगपतियों पर प्रति टन 100 रुपए रंगदारी देने का अनुचित दबाव बनाया।

पीयूष कुमार साहू :

निलंबित आईएएस अधिकारी रानू साहू के भाई पीयूष कुमार साहू ने कोयला लेवी से अर्जित अवैध काली कमाई को अपनी बहन और परिजनों के नाम पर रियल एस्टेट परिसंपत्तियों में निवेश कराने का मुख्य कार्य किया। परिवार द्वारा खरीदी गई 13 अचल संपत्तियों में बैंक खातों के औपचारिक अंतरण के अतिरिक्त भारी मात्रा में रजिस्ट्री मूल्य से ऊपर नकद राशि का भुगतान किया गया, जिसका जरिया पीयूष के खाते बने।

जोगेंदर सिंह :

सूर्यकांत तिवारी के प्रमुख व्यावसायिक भागीदार जोगेंदर सिंह ने जय अंबे रोड लाईन्स के जरिए नकदी की त्वरित आवाजाही और अपनी विभिन्न व्यावसायिक फर्मों के खातों से बैंक प्रविष्टियां (एंट्री) उपलब्ध कराने का संगठित कार्य संभाला। सात शेल व सहयोगी फर्मों के खातों में भेजी गई 40 करोड़ रुपए से अधिक की संदिग्ध राशि और उसके अंतर्राज्यीय लेन-देन का पूरा ब्योरा चालान में संलग्न है।

अनुराग चौरसिया :

तत्कालीन उपसचिव सौम्या चौरसिया के पारिवारिक सदस्य अनुराग चौरसिया की सीधी भूमिका कोयला लेवी से उपजी काली कमाई को परिजनों के नाम फ्लैट्स, व्यावसायिक भूखंडों और कृषि भूमि में निवेश करने में रही। इसके लिए मोटल मधुबन और रिश्तेदारों के निजी बैंक खातों का इस्तेमाल कर लेयरिंग के जरिए रकम का शोधन किया गया।

दीपेश टांक :

दीपेश टांक ने सिंडिकेट की अवैध नकदी को कृषि भूमि के सौदों में खपाने का काम किया। भूमि सौदों में सरकारी रजिस्ट्री मूल्य के अलावा करोड़ों रुपए की अतिरिक्त नकद राशि प्राप्त की गई और बाद में उस अवैध नकदी को वैध दिखाने के लिए ‘कृषि आय’ के रूप में दर्शाने का षड्यंत्र रचा गया। वह भूमि बिक्री के उपरांत भी ओम एग्रो फार्म के वित्तीय संचालन से जुड़े रहे।

सुनील कुमार अग्रवाल :

इंद्रमणि समूह के उद्योगपति सुनील कुमार अग्रवाल पर सिंडिकेट की बड़ी नकद रकम को अपने सुरक्षित ठिकानों पर रखने, आवश्यकतानुसार उसे आगे वितरित करने तथा कोल वॉशरी की खरीद में अवैध लेवी के धन को बड़े पैमाने पर निवेश कराने के गंभीर आरोप चालान में दर्ज हैं।

राहुल मिश्रा :

सूर्यकांत तिवारी की रियल एस्टेट और निर्माण परियोजनाओं का प्रबंधन संभालने वाले राहुल मिश्रा के पास सिंडिकेट की बेहिसाब नकद रकम की सुरक्षा का जिम्मा था। जांच एजेंसी को पुख्ता प्रमाण मिले हैं कि जरूरत पड़ने पर निखिल चंद्राकर के माध्यम से यह भारी नकदी वापस सूर्यकांत तिवारी को उपलब्ध कराई जाती थी।

विशेष अदालत द्वारा इस साढ़े नौ हजार पन्नों के पूरक चालान का संज्ञान लिए जाने के बाद अब सभी आरोपियों के विरुद्ध आरोप तय करने और न्यायिक विचारण की अगली कानूनी प्रक्रिया प्रारंभ की जायेगी।