परिवार : मां यशोदा को अपने पुत्र कान्हा से प्राणों से भी अधिक प्रेम था, जब कान्हा पर कोई संकट आता तो मां यशोदा की चेतना भी चली जाती थी। फिर कान्हा को वापस पाने पर ही मां यशोदा में चेतना का संचार होता। ऐसा था वात्सल्यमयी यशोदा का अपने पुत्र श्रीकृष्ण के लिए प्रेम। लेकिन लाड़-प्यार के साथ ही कान्हा की गलतियों की सजा देने में मां यशोदा जरा भी संकोच नहीं करती थी। मां यशोदा ने श्रीकृष्ण को साधारण बालक जान संस्कारों का पाठ पढ़ाया। असल में माता-पिता की दी गई शिक्षा और संस्कार ही बच्चे के कर्मों का मोल है। माता-पिता अपनी संतानों का जैसा चरित्र बनाते हैं वैसा ही उनका भविष्य बनता है। लेकिन कुछ माता-पिता बच्चे का भविष्य सुरक्षित करने की चिंता में चरित्र का निर्माण करना भूल जाते हैं। इसलिए मां यशोदा की तरह हर मां-पिता को बच्चे में संस्कारों का बीज डालना चाहिए।
अब बदलते समय में क्या होना चाहिये :
पहले की अपेक्षा आज आपके परिवार के बीच मोबाईल और टीवी जैसे उपकरण आ गये है, जो आपके पारिवारिक सदस्यों के बीच दूरियां पैदा कर रहे है, सबसे पहले तो माँ-बाप को यह समझना आवश्यक है कि जिन परिस्थितियों में उन्होंने जीवन जीया वैसा आज का समय नहीं है, जो माँ-बाप है वो पहले खुद भी किसी की संतान थे, पहले के समय में एक कमाता था तो 10 खाते थे और आज सबको कमाना मजबूरी हो गई है, इसलिये संसाधन ज्यादा है और सबके पास समय की कमी है , कोई खाली भी बैठा है तो मानसिक तौर पर वह भी व्यस्त है, घर के बुजुर्ग अपनी बातों को लेकर बच्चों पर अपना प्रभाव डालने का लगातार प्रयास करते है, और कहते रहते है हमने इतनी मेहनत की, इतनी जिम्मेदारियां निभाई, साइकिलों पर काम किया आदि, लेकिन माँ-बाप ये नहीं समझना चाहते की आज हमें जरूरत है तो अपने बच्चों की मानसिकता समझने की ना कि अपनी बातें उन्हें समझाने की, आज कल हर परिवार में और हमेशा से ही पूर्व पीढ़ी और वर्तमान पीढ़ी में मतभेद होते रहे है, लेकिन पहले समय होता था, तो एक दुसरे से वापस मेलजोल बना लेते थे, उसका एक मुख्य कारण सहनशीलता भी थी जो आज लगभग ख़त्म हो चुकी है।
आज अगर बीटा दारू पीकर आ जाये तो बिना उसके मनोभाव को समझे बच्चे को डांटना शुरू कर देते है, उसकी तहतक जाने का प्रयास नहीं करते, आज बच्चे की बुराइयों स्वीकार कर सुधारने की जरूरत है ना कि उन्हें डांटते रहने की, डांटने से बच्चे आपसे दूर हो जायेंगे और कभी मुसीबत में फंसे तो आप उन्हें बचा नहीं पायेंगे, बढती प्रतिस्पर्धा और तनाब इसका मुख्य कारण है, कम शब्दों में इतना ही समझिये कि बच्चों को समझाने के बजाये उन्हें समझिये। बातें तो बहुत है, लेकिन जरुरी नहीं की कोई आपको जगाये बल्कि आप खुद भी समझें।
धैर्य रखने की प्रेरणा :
मां यशोदा श्रीकृष्ण की चंचलता से परेशान रहती हैं। लेकिन कभी उन्होंने उन्हें दंडित नहीं किया। एक बार उन्होंने छड़ी उठाई थी लेकिन उन्होंने फेंक दी। इसके बाद उन्होंने श्रीकृष्ण को ओखली में बंधाने का विफल प्रयास किया था।
दोस्तों के साथ मिलकर रहना :
कृष्ण के अच्छे रिश्तों के पीछे मां यशोदा का ही हाथ था। वह बचपन से दोस्तों यानी ग्वाल-बाल के साथ मिलकर रहने का संस्कार देती थीं। यशोदा ने कभी भी श्रीकृष्ण को यह दंभ नहीं होने दिया कि वे राजा परिवार से संबंध रखते हैं।
संतान पर भरोसा करना :
मां यशोदा हमेशा कृष्ण के लिए चिंतित रहती हैं। वह क्या करते हैं इसके लिए जागरूक भी रहती हैं। साथ में उन्हें पूरा भरोसा रहता है कि कन्हैया गलत नहीं करेगा। गोपियों की झूठी बातों पर भरोसा नहीं करतीं थी उन्हें अपने संस्कारों पर पूरा भरोसा था।
हम जो करते हैं बच्चे वही सीखते :
बच्चे में न तो कोई गुण होता है और न ही कोई दोष, तो ये गुण-दोष उसमें किस तरह से आता है। इस पर हमें विचार करने की जरूरत है। असल में बच्चा माता-पिता के मुंह से जो बात निरंतर सुनता है वही बात उसके हृदय का संस्कार बनती है यानी माता-पिता की इच्छाएं ही संतान के हृदय में गुण-दोष के रूप में जन्म लेती हैं, फिर उन्हीं बातों के लेकर माँ-बाप भी बच्चों को गलत कहने लगते है। मां यशोदा हमेशा से ही कन्हैया को अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करती हैं। गोपियों का माखन खाने की सूचना मिलने पर उन्हें दंडित भी करती हैं।
डांटने-मारने की जगह प्रलोभन देना :
बच्चोें की परवरिश में माता-पिता का बहुत अहम रोल होता है। आजकल के माता-पिता अपने बच्चे को छोटी-छोटी बातोें के लिए डांटते और मारते हैं। बच्चे अगर जिद्दी है तो भी उन्हें प्यार से समझाना जरुरी है, दूसरी तरफ बच्चों को दूसरे तरीकों जैसे कि उन्हें चीजों का प्रलोभन देकर अपने मन के हिसाब से काम करवाया जा सकता है। मां यशोदा भी श्रीकृष्ण को डांटने की जगह प्रलोभन देती हैं। उन्हें उनके मन पसंद माखन-मिश्री का हवाला देकर कई काम करवा लेती हैं।
जरुरी है बच्चों को समझाने , डांटने और चिल्लाते रहने से बेहतर है उन्हें समझना, पहले उनकी बुराई को स्वीकार कीजिये, उन्हें अपने विश्वास में लीजिये, जिससे वो अपनी गलतियाँ , बुराइयाँ आपसे छुपाये बल्कि वो खुद आपको बताये भी, उसके बाद उसे उस बुराई से दूर होने के बारे में समझाईये।