स्टॉप एंड रन सिग्नल : भारतीय रेल में मालगाड़ी के हालात आज भी वही है, आज तक नहीं आया बदलाव, ये जुगाड़ अब भी मजबूरी है।

भारतीय रेलवे : जहाँ सामने यात्री ट्रेनों में बदलाव इस कदर हो चुका है, कि वंदे भारत, तेजस और दूरंतो जैसी ट्रेनों को पटरी पर दौड़ाकर नया रेलवे नये आयाम कायम कर रही है, वहीँ भारतीय रेलवे अब तक मालगाड़ी की एक कमी को नहीं बदल सकी है। आज भी मालगाड़ी के वैगन के दरवाजे जुगाड़ से ही बंद होते हैं। यह देखने में भी अटपटा लगता है और कब जीआई तार टूटकर दरवाजे खुल जाए, और भरा हुआ माल ट्रैक पर कब गिर जाये इसका कोई भरोसा भी नहीं है।

ट्रेनों के साथ-साथ स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाने का सपना देख रही रेलवे आज तक वैगन के दरवाजे पर लगे जीआई तार के जोड़ का तोड़ नहीं निकाल सकी है। जिस तरह प्रत्येक मालगाड़ी के वैगन में यह जुगाड़ के लॉक नजर आ रहे हैं, उससे माना जा सकता है कि चाहे जितना बदलाव कर लें, इस अव्यवस्था में सुधार होने वाली नहीं है। यात्रियों के बीच ऐसे वैगनों को देखकर चर्चा आम रहती है कि रेलवे को जुगाड़ के कार्य पसंद है, यहाँ रेलवे इसको लेकर लापरवाह है।

गलती हुई है तो सुधार कीजिए रेलवे में गलती होनी आम बात है। कभी छोटी तो कभी बड़ी। यह किसी से भी हो जाती है। इसकी भरपाई यही है कि तत्काल सुधार कर लिया जाए। इससे न उंगली उठेगी और न सूचना के अधिकार का आवेदन लगने के बाद हाथ-पैर फूलेंगे। लेकिन, एक अफसर को कौन समझाए। पिछले दिनों उन्होंने एक ट्रेनिंग स्कूल में गलती से ऐसी गड़बड़ी कर दी, जिसकी भनक भी रेलवे बोर्ड तक पहुंच गई।

दरअसल उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर स्कूल में छोटे अधिकारी की पोस्टिंग कर दी, जो उस पद के लिए योग्य नहीं था। चयन आदेश जारी होने के बाद जब खलबली मची और उनसे कहा कि पोस्टिंग प्रक्रिया रद्द कर दें तो वह नहीं माने। वह अपनी गलती भी मानने को तैयार नहीं हैं। यदि वह गलती सुधार लेंगे तो किरकिरी हो जाएगी, अफसर किसी भी सूरत में यह नहीं चाहते। इसका खामियाजा विद्यार्थियों को भुगतना पड़ सकता है। बेहतर कार्यशैली के लिए उत्कृष्ट अधिकारी का होना बहुत ही जरूरी है। उत्कृष्टता से मतलब केवल सरकारी कामकाज नहीं है बल्कि अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ बेहतर व्यवहार भी होना आवश्यक है। विभाग चाहे जो हो, यह तो सच है कि कामकाज की जिम्मेदारी कर्मचारी ही संभालते हैं। कर्मचारियों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चलना ही पड़ता है।

लेकिन, कमर्शियल विभाग के नए साहब का रवैया इसके बिल्कुल विपरीत है। बड़ा दफ्तर छोटे कार्यालय में आने के बाद भी उनके काम का तरीका पहले की तरह है। हर छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों से बेवजह झिकझिक करते रहते हैं और यदि मनाही करें तो उन्हें कार्यवाही कर देने की धमकी भी देते हैं। अफसर की वजह से कार्यालय का माहौल पूरी तरह असंतुलित हो गया है।

कुछ कर्मचारी तो अपना तबादला इधर-उधर करने की जुगत लगानी भी शुरू कर दी है, ताकि अफसर की झिकझिक का सामना न करना पड़े। ये पब्लिक सब जानती है यात्रीगण कृपया ध्यान दें, सफर के दौरान ट्रेन व कोच को साफ रखें। इधर-उधर बिखरे कचरे व गंदगी सभी के लिए हानिकारक है। रेलवे हर साल 15 दिन स्वच्छता को लेकर इसी तरह जागरूकता दिखाती है। हेल्पलाईन नंबर के जरिये भी कार्यवाही हो जाती है।

पखवाड़ा समाप्त होने के बाद कोई झांककर तक नहीं देखता। अभी स्थिति कुछ इसी तरह ही है। प्लेटफार्म, पटरी और ट्रेन कहीं भी चले जाइए स्वच्छता तो दूर जिन पर सालभर इसकी जिम्मेदारी होती है, वह देखने तक नहीं जाते। यही वजह है कि जब पखवाड़ा चलता है तो आम यात्री का रेलवे के इस जागरूकता अभियान का किसी तरह फर्क नहीं पड़ता या यूं कहें कि यात्री इसे गंभीरता से नहीं लेते। उन्हें मालूम होता है कि पखवाड़ा खत्म तो स्वच्छता का अध्याय भी समाप्त हो जाएगा। आम यात्री चाहते हैं कि अभियान सीमित दिनों के लिए नहीं होना चाहिए,नियमित रूप से कार्य होगा तो निश्चित तौर पर वह बदलाव जरूर आयेगा। अब रायपुर के रेलवे स्टेशन में भी सुबह 6 बजे सफाई का काम शुरू हो जाना चाहिये, इतने महंगे दाम में सफाई का ठेका देने के बाद भी हाल – बेहाल रहता है।