बिलासपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी में 5 कपड़ा व्यापारियों को उधार वसूलने के नाम पर पीड़ित को परेशान करने की खबर सामने आई थी, जहाँ पीड़ित ने आत्महत्या कर ली, और आत्महत्या के लिये प्रेरित करने के नाम पर उक्त व्यापारियों को कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई। अब ऐसा ही एक मामला बिलासपुर हाईकोर्ट में आया, जिसमें आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी व्यक्ति ने उधारी में किसी को पैसा दिया है तो उसे वापस पाने का हकदार भी है। उधार दिए पैसे वापस मांगना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं है। हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दर्ज FIR को निरस्त कर दिया है।
दरअसल, पेशे से शिक्षक नरेश यादव ने शैला सिंह को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़ी एक सरकारी योजना पेश की और उसमें राशि निवेश करने की बात कही। शैला सिंह ने तकरीबन 10 लाख रुपए नरेश को दिए। राशि लेने के बाद नरेश यादव ने याचिकाकर्ता की संस्था सहित संबंधित संस्था को उसके हिस्से की राशि नहीं लौटाई।
याचिका के अनुसार जब उसने राशि वापस पाने के लिए कॉल किया तब फोन उठाना बंद कर दिया। नाराज याचिकाकर्ता ने नरेश को राशि वापस नहीं लौटाने पर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इससे परेशान नरेश की पत्नी ने डर के कारण जहर खाकर जान दे दी। नरेश की शिकायत पर पुलिस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा 306 के तहत खुदकुशी के लिए उकसाने का अपराध दर्ज किया और आरोप पत्र कोर्ट में पेश किया।
FIR को हाईकोर्ट में दी चुनौती :
शैला सिंह ने पुलिस की ओर से दर्ज FIR को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया कि उसने कर्जदार की पत्नी को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित नहीं किया है। शिकायतकर्ता के पास इस संबंध में कोई साक्ष्य भी नहीं है।
पुलिस ने झूठी शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर किया है। याचिकाकर्ता ने FIR और आरोप पत्र को रद्द करने की मांग की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए पुलिस द्वारा दर्ज FIR और विचारण न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया है।