बॉलीवुड : जहाँ इस वर्ष शाहरुख़ खान की पठान को लेकर बहिष्कार हो रहा था, वहीँ शाहरुख़ का बयान आया, शाहरुख खान ने कहा कि कुछ ऐसे लोग हैं जो सोशल मीडिया पर नेगेटिविटी फैलाने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि सिनेमा समाज को बदलने का एक साधन है। कुछ दिनों से हमलोग यहां पर नहीं आए हैं, आपलोगों से मुखातिब नहीं हो पाए हैं, आपलोगों से मिल नहीं पाए हैं, लेकिन अब दुनिया जो है नॉर्मल हो गई है, हम सब खुश हैं, मैं सबस ज्यादा खुश हूं। और ये बात बताने में मुझे बिल्कुल भी आपत्ति नहीं है कि दुनिया कुछ भी कर ले…मैं और आपलोग और जितने भी पॉजिटिव लोग हैं सबके सब…जिंदा हैं।
दूसरी तरफ जब जवान और पठान की हिट होने की कहानी आपने सुनी तो आपको एक तसल्ली जनक विश्वास नहीं हो रहा होगा, वहीँ जब गदर 2 हित हुई तो उसके आंकड़ों पर आपको प्राकृतिक तौर पर विश्वास हुआ होगा, अगर ये मार्केटिंग फंडा साईड रख दिया जाये तो ग़दर 2 इस वर्ष की नेचुरली हिट फिल्म मानी जायेगी।
बॉलीवुड इंडस्ट्री में रिलीज हुई फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन दिनों चल रहे कट-थ्रोट कंपीटिशन ने कई प्रोड्यूसर्स और स्टूडियोज को अपने फेक कलेक्शन को प्रेजेंट करने पर मजबूर किया है।
जवान जब रिलीज होने वाली थी, तब शाहरुख खान लगातार सोशल मीडिया पर फिल्म की एडवांस बुकिंग का अपडेट दे रहे थे। उन्हें ऐसा करने की जरूरत क्या पड़ी? इसी बीच एक फैन ने शाहरुख खान से ट्विटर पर सवाल कर डाला कि वो इस बात की क्लैरिटी दे दें कि एडवांस बुकिंग में से कितने टिकट्स ऑर्गेनिक हैं और कितने कारपोरेट बुकिंग के. शाहरुख तो इस तरह के सवाल पर समझाइश देकर आगे बढ़ गए लेकिन इससे बॉलीवुड फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन की सत्यता पर सवाल खत्म नहीं हुए. सवाल ये भी उठा कि आखिर इंडस्ट्री के प्रोड्यूसर्स और मेकर्स द्वारा ट्रेंड में लाया गया ‘कारपोरेट बुकिंग’ का फंडा है क्या?
क्या है कॉरपोरेट बुकिंग :
आम भाषा में कॉरपोरेट बुकिंग का मतलब समझा जाए, तो अर्थ निकलता है किसी प्राइवेट कंपनी द्वारा अपने निजी कारणों की वजह से की जाने वाली बुकिंग। हालांकि इसे इंडस्ट्री के नजरिये से देखा जाए, तो यहां चीजें कई परतों में हैं। यहां कॉरपोरेट के अलावा ब्लॉक बुकिंग टर्म का इस्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे के कई परदे होते है।
समझें ब्लॉक बुकिंग और कॉरपोरेट बुकिंग में अंतर :
जाने माने ट्रेड एनालिस्ट गिरीश जौहर समझाते हैं, कि अगर कोई फिल्म रिलीज हो रही हो और उसकी बुकिंग बल्क में उसी फिल्म के स्टूडियो हाउस या प्रोड्यूसर ने करवाई है, तो उसे कॉरपोरेट बुकिंग कहा जायेगा। कॉरपोरेट बुकिंग ब्रांड के जरिए भी की जाती है। इसमें एक से ज्यादा शहरों में एक साथ भारी तादाद पर टिकट की बुकिंग होती है। वहीं ब्लॉक बुकिंग वो होती है, जिसमें किसी फैमिली ग्रुप या फैन क्लब के मेंबर्स छोटे लेवल पर टिकट खरीदते हैं। ये केवल एक सिनेमाघर और शहर तक सीमित होती है। वैसे सामान्यतौर पर कई कम्पनियाँ भी अपने विक्रेताओं के लिये बल्क बुकिंग करवाती है।
पुराने समय से चलता आ रहा है ये ट्रेंड :
गिरीश आगे कहते हैं, ऐसा पहले भी होता था, कई प्रोड्यूसर्स टिकट्स खरीदकर थिएटर को हाउसफुल करार दे देते थे। उस वक्त थिएटर में जब हजार ऑडियंस की सीट्स होती थी, लेकिन टिकट नौ सौ ही बिके, तो प्रोड्यूसर थिएटर वालों से कहता था कि चलो सौ टिकट मेरे नाम से काट दो, ताकि फिल्म हाउसफुल करार दी जा सके। लेकिन उस वक्त मेकर्स इसका इतना प्रेशर नहीं लेते थे। हालांकि अब तो अति हो गई है, पूरा थिएटर खाली पड़ा है और प्रोड्यूसर ने टिकट खरीदकर उसे हाउसफुल डिक्लेयर कर दिया है। हालांकि इससे नुकसान प्रोड्यूसर्स का ही दिखता है, वो अपने ही पैसे लगा रहा है, थिएटर हाउसफुल होने पर प्रोड्यूसर्स को जीएसटी भी भरना पड़ता है, लेकिन कहानी इसके आगे शुरू होती है। इसी तरीके से “दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे” को भी मराठा थियेटर में 25 साल तक एक शो लेकर चलाया गया।
क्या फिल्मों के लिए वाकई फायदेमंद है यह ट्रेंड :
इसके पीछे मकसद है स्टार्स के कलेक्शन को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का ताकि उस एक्टर की ब्रांड वैल्यू को और बढ़ाया जाए, जिससे उसके नाम पर आगे फिल्में बिकें। दूसरा मकसद इस तरह के फेक डेटा बनाकर दर्शकों के बीच एक सरप्राइज व एक्साइटिंग फैक्टर जगाना होता है, ताकि थिएटर पर उनका फुटफॉल बढ़े। पिछले कुछ सालों में जितनी भी कलेक्शन रिपोर्ट्स रही हैं, मैं इसे दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर मेकर्स यह कह भी दें कि हमारा टिकट सौ प्रतिशत बिक चुका है, तो इस बात में बिलकुल भी सच्चाई नहीं होगी। हालांकि इसका फायदा जुए की तरह होता है। कई बार यह ट्रिक काम कर जाती है, तो कई बार इस ट्रेंड की वजह से प्रोड्यूसर को ही भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। फायदा तो इसका कम ही होता है लेकिन नुकसान ज्यादा होता है।
एडवांस बुकिंग का होता है प्रेशर :
साउथ इंडस्ट्री के जाने माने ट्रेड एनालिस्ट रमेश बाला इस कॉरपोरेट बुकिंग के एक और पहलू पर ध्यान दिलाते हैं, ‘आज के दौर में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ चुकी है कि मेकर्स को मार्केटिंग के अलग-अलग हथकंडे आजमाने पड़ते हैं। खासकर पिछले कुछ समय से शुरू हुए एडवांस बुकिंग के प्रेशर ने प्रोड्यूसर्स व मेकर्स को मजबूर किया है। फिल्म का पहला इंप्रेशन अच्छा बनाने के लिए वो एडवांस टिकट के जरिए कॉरपोरेट बुकिंग करते हैं, जिससे एडवांस बुकिंग हाउसफुल या 80 प्रतिशत बताए, तो जाहिर सी बात है, अगर किसी को पता चले कि टिकट एडवांस में ही हाथो-हाथ बिक गई है, तो आपका भी उस फिल्म के प्रति इंट्रेस्ट बढ़ेगा।’ हालाँकि कई बार ऐसा नहीं हो पाता क्यूंकि कलाकार और फिल्मों के प्रशंसक अपने हिसाब से ही थियेटर तक आते है।
रमेश कहते हैं, आप ये समझ लें, कई बार जब कोई दर्शक बुकिंग के लिए साइट खोलता है और देखता है कि पूरी सीटें खाली हैं, तो उसके जेहन में यह बात जरूर आती है कि शायद फिल्म अच्छी नहीं है, इसलिए लोग उसे देख नहीं रहे हैं। वहीं अगर ऐप में टिकट सोल्ड आउट दिखा दें, तो कहीं न कहीं आपके अंदर एक उत्सुकता जगती है कि टिकट अगर इतनी तेजी से बिक रही है, तो जाहिर सी बात है फिल्म जरूर एंटरटेनिंग होगी। कई बार मेकर्स की यह ट्रिक काम कर जाती है और टिकट्स की ऑर्गेनिक बुकिंग तेज पकड़ती है। आम तौर पर ऐसा कम ही होता है।
अब कहां फंस गए हुई चूक :
कहा जाता है, ये पब्लिक है सब जानती है. हुआ भी यही कोरोना के बाद जिस तादाद में फिल्म के कलेक्शन के डेटा को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाने लगा, तो दर्शकों के बीच शक पैदा होना लाजमी था। अब खुद दर्शक भी इस कारपोरेट बुकिंग टर्म से परिचित हैं। यही वजह है, जब जवान के वक्त शाहरुख खान #AskSRK के तहत फैंस से इंटरैक्ट कर रहे थे, तो किसी फैन ने उनसे सवाल भी किया एडवांस बुकिंग में कितने टिकट्स कॉरपोरेट बुकिंग के तहत किए गए हैं। जिसके जवाब में शाहरुख ने कॉरपोरेट बुकिंग को सोशल मीडिया वाली घटिया बातें करार देकर पॉजिटिव चीजों पर फोकस करने की नसीहत दे डाली थी। इतना ही नहीं ट्विटर पर कई फैंस टिकट बुकिंग साइट का स्क्रीनशॉट और खाली थिएटर की तस्वीर को एकसाथ पोस्ट कर कॉरपोरेट बुकिंग का पर्दाफाश करते नजर आए थे।
बॉलीवुड ही हमेशा टारगेट क्यों :
जाने-माने ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श कॉरपोरेट बुकिंग से बिल्कुल भी इत्तेफाक नहीं रखते। तरण के अनुसार इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल कर इंडस्ट्री के खिलाफ झूठा नरैटिव फैलाया जाता है। तरण बताते हैं, ऐसी कोई बात नहीं है। अगर कोई ब्रांड किसी फलां एक्टर को इंडोर्स करता है, तो वो उसकी टिकट खरीद लेते हैं। इसमें हर्ज क्या है? वो एक्टर तो अपनी जेब से पैसे नहीं खर्च रहा है न। दूसरी बात ये बॉलीवुड को हमेशा टारगेट किया जाता है। अभी कई लोग कहते हैं कि अरे देखो, फैंस थिएटर के सारे टिकट्स खरीद रहे हैं… एक आदमी ने पचास टिकट खरीद लिए हैं.. अरे भई, जब साउथ में इस तरह से लोग करते हैं, तब आपको दिक्कत नहीं होती है। बॉलीवुड में हो जाता है, तो दिक्कत होने लगती है।
तरण आगे कहते हैं, प्रोड्यूसर्स तो ऐसा बिलकुल भी नहीं करते हैं। वो ऐसा करके खुद का नुकसान थोड़े न करवायेगा। आप कितना टिकट्स खरीदोगे? फिल्में थोड़ी न दस-पंद्रह स्क्रीन पर लगती हैं। आजकल तो एक-एक थिएटर में 20 से 30 शोज होते हैं। किसी एक्टर में इतनी ताकत भी नहीं है, कि वो पूरे देश में पहले दिन की टिकट खरीदकर खुद का ही नुकसान कर ले। देखो उन्हें एक शब्द मिल गया है, कारपोरेट बुकिंग, जिसे वो उछालते हैं बिना किसी मतलब के। बदनाम करने के लिए, जो ये कह रहे हैं, क्या उनके पास ये सबूत है. उन्होंने किसी एक्टर व प्रोड्यूसर को ऐसे खर्च करते हुए देखा है। आप ऐसे इल्जाम क्यों लगाते हैं? सोशल मीडिया पर बहुत सारी अफवाहें उड़ाई जाती हैं, इसका ये कतई मतलब नहीं है कि वो सारी बातें सही हों। लेकिन दर्शक भी अपने दिमाग का कम इस्तेमाल नहीं करते।