स्वास्थ्य : मुख्यतौर पर विटामिन डी का जरिया सुबह सूर्य की धूप है, लेकिन अन्य चीजों के जरिये भी इसकी कमी को दूर किया जा सकता है, अगर आप हर रोज थोड़ी देर धूप में बैठते हैं और अपने आहार में विटामिन डी से भरपूर कुछ चीजों को शामिल करते हैं, तो आप अपने शरीर में विटामिन डी की कमी को पैदा होने से रोक सकते हैं। जब शरीर में विटामिन डी की ज्यादा कमी होती है, तब डॉक्टर से सलाह लेकर विटामिन डी सप्लीमेंट्स का सेवन किया जा सकता है। वहीं, थोड़ी-बहुत विटामिन डी की कमी होने पर आहार में थोड़े बहुत बदलाव करके इस कमी को दूर किया जा सकता है।
विटामिन डी कैसे बढ़ाएं – पुराने जमाने से विटामिन डी बढ़ाने के लिए धूप में बैठने की और दूध का सेवन करने की सलाह दी जाती रही है। लेकिन खाने-पीने की दूसरी चीजों का सेवन करके भी इस विटामिन की कमी को दूर किया जा सकता है। फोर्टिफाइड संतरे का जूस विटामिन डी का अच्छा सोर्स माना जाता है। विटामिन डी को शरीर में अवशोषित करने के लिए एवोकाडो का सेवन भी किया जा सकता है। विटामिन डी की कमी से हड्डियाँ कमजोर होती है और मांसपेशियों में खिंचाव पैदा होता है।
फायदेमंद उत्तम खाद्य पदार्थ – स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक अंजीर में विटामिन डी की मात्रा पाई जाती है। क्या आप जानते हैं कि पोषक तत्वों से भरपूर बादाम विटामिन डी के अवशोषण में मदद कर सकता है। मशरूम में भी विटामिन डी की अच्छी खासी मात्रा पाई जाती है। विटामिन डी के लिए आप हरी पत्तेदार सब्जियों को आहार में शामिल कर सकते हैं। वसायुक्त मछली और अंडे की जर्दी को भी विटामिन डी का अच्छा स्रोत माना जाता है।
गौर करने वाली बात – आपकी जानकारी के लिए बता दें कि विटामिन डी से भरपूर खाने और पीने की इन चीजों को जब सही मात्रा में और सही तरीके से खान-पान में शामिल किया जाएयेगा, तभी आपको बेहतर परिणाम हासिल हो पाएंगे। जरूरत से ज्यादा मात्रा में इन चीजों को खाने से या फिर गलत तरीके से आहार का हिस्सा बनाने से सेहत पर सकारात्मक की जगह नकारात्मक असर भी पड़ सकता है।
विटामिन डी की कमी से होने वाले नुकसान :
शरीर को सभी प्रकार के पोषक तत्व चाहिये होते है, ऐसे में विटामिन डी की कमी से हड्डियां कई बार कमजोर होती हैं (बच्चों में रिकेट्स, बड़ों में ऑस्टियोपोरोसिस), जिससे दर्द, थकान, मांसपेशियों में खिंचाव, कमजोरी और ऐंठन होती है; यह रोगप्रतिरोधक प्रतिरक्षा प्रणाली, हृदय स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे उच्च रक्तचाप और अवसाद का खतरा बढ़ सकता है। इसकी कमी से हड्डियों का घनत्व कम होता है, हड्डियाँ कमजोर हो जाती है जिससे फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ता है और शिशुओं में दौरे पड़ सकते हैं।



