बिरसा मुण्डा शहीद दिवस आज, आदिवासियों के महानायक।

सम्पादकीय : 9 जून 2026, भारतीय इतिहास के एक महान नायक, जननायक और आदिवासी समाज के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा का शहीद दिवस है। इस दिन हम उनके अद्वितीय साहस, अदम्य भावना और अंग्रेजों के खिलाफ उनके कार्यों को याद करते हैं। मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो वीरता और क्रांति का परिचय दिया, वह सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। 

बिरसा मुंडा जीवन परिचय : 

बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातू गांव में हुआ था। उनका बचपन आदिवासी समाज पर हो रहे अत्याचारों, शोषण और ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों को देखते हुए बीता, जिसने उनके मन में अन्याय के खिलाफ लड़ने का साहस भर दिया। उन्होंने शुरुआती शिक्षा जर्मन मिशन स्कूल में प्राप्त की, लेकिन जल्द ही उन्होंने ईसाई मिशनरियों के भेदभाव और अंग्रेजों के शोषणकारी नीतियों को समझ लिया। यहीं से उन्होंने आदिवासी समुदाय की स्वतंत्रता और अपने अधिकारों की रक्षा का सपना देखना शुरू किया।

उनकी वीरता और ‘उलगुलान’ की कहानी : बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज के शोषण, धर्मांतरण और ज़मीन हड़पने की ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ महाविद्रोह किया, आवाज़ उठाई। उन्होंने 1895 में ‘बिरसाइत’ नामक एक नए धर्म की स्थापना की, जिसमें मुंडा समुदाय के लोगों को एकजुट किया। उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, नशाखोरी और जीव हत्या जैसी कुरीतियों के खिलाफ भी जन जागरण अभियान चलाया।

आज भी उनकी वीरता की कहानियां लोककथाओं में जीवित हैं :

  • जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा का आह्वान: बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों, जमींदारों और साहूकारों के खिलाफ आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए विद्रोह का आह्वान किया। यह विद्रोह लगभग 6 वर्षों तक चला और इसमें हजारों आदिवासी शामिल हुए। यह सिर्फ एक विद्रोह नहीं था, बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए एक महान संग्राम था।

बिरसा मुंडा की रणनीति ने किया था अंग्रेजों की नाक में दम :

बिरसा मुंडा ने अपने गुरिल्ला युद्ध रणनीति से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। उनकी सेना तीर-कमान और पारंपरिक हथियारों से लैस थी, लेकिन उनका साहस और रणनीति अंग्रेजों की आधुनिक सेना पर भारी पड़ती थी। अंग्रेजों को उन्हें पकड़ने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

डोंबारी बुरू संघर्ष :

9 जनवरी 1900 को, रांची के पास डोंबारी बुरू पहाड़ी पर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासियों और अंग्रेजों के बीच अंतिम निर्णायक लड़ाई हुई। इस भीषण संघर्ष में अंग्रेजों ने आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए। खून से लथपथ डोंबारी बुरू और तजना नदी का पानी लाल हो गया था। हालांकि इस नरसंहार में अंग्रेजों को जीत मिली, बिरसा मुंडा उनकी पकड़ में नहीं आए।

500 रुपये का इनाम :

बिरसा मुंडा के बढ़ते प्रभाव से ब्रिटिश सरकार इतनी भयभीत हो गई थी कि उन्होंने उन्हें पकड़ने के लिए 500 रुपए का भारी इनाम घोषित कर दिया था, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी। कुछ देशद्रोही तथी विश्वासघातियों की मुखबिरी के कारण, बिरसा मुंडा को 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल से गिरफ्तार कर लिया गया।

रांची जेल में शहादत :

बिरसा मुंडा को रांची जेल में कैद कर दिया गया। 9 जून 1900 को, रहस्यमय परिस्थितियों में, महज 25 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। ब्रिटिश सरकार ने उनकी मौत का कारण हैजा बताया, लेकिन आदिवासी समाज और कई इतिहासकार मानते हैं कि उन्हें जेल में धीमा जहर दिया गया था।

बिरसा मुंडा का जीवन और शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समाज के अदम्य साहस और उनके जल, जंगल, जमीन के लिए किए गए बलिदान का प्रतीक है। उन्हें आज भी धरती पिता और भगवान के रूप में पूजा जाता है। उनकी महान क्रांति हमें सिखाती है कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना कितना महत्वपूर्ण है।