देश : अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव 2024 में अब कुछ महीनों का ही वक्त बचा है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अपनी नई टीम का ऐलान किया है। जैसे ही पार्टी ने नए नामों का ऐलान किया इसमें दो नाम सुनकर लोग चौंक गए। लोकसभा और राज्यसभा में एक भी मुस्लिम सांसद न होने वाली पार्टी ने अपनी पार्टी में दो मुस्लिम राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए है। इनमें से एक अब्दुल्ला कुट्टी और एक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर तारिक मंसूर का नाम शामिल है। आइए जानते है कि चुनाव में मुस्लिमों को टिकट देने से बचने वाली BJP अब उन्हें पार्टी में जगह क्यों दे रही है? लेकिन पहले जान लेते है कि ये दोनों मुस्लिम नेता कौन है?
कौन है अब्दुल्ला कुट्टी?
अब्दुल्ला कुट्टी मूल रूप से केरल के रहने वाले है। इसके साथ ही वह लोकसभा के सदस्य भी रह चुके है। फिलहाल वह भारतीय हज समिति के अध्यक्ष है। वह लंबे समय से पार्टी से जुड़े हुए हैं। पार्टी दक्षिण भारत में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। इस दौरान उसे वहां एक मजबूत मुस्लिम नेता की जरूरत है। ऐसे में कुट्टी पार्टी की पहली पसंद हैं। अप्रैल 2022 में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ए. पी. अब्दुल्ला कुट्टीभारतीय हज समिति के नए अध्यक्ष निर्वाचित किए गए थे।
यूपी विधान परिषद के सदस्य हैं तारिक मंसूर :
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाईस चांसलर तारिक मंसूर को भी भाजपा ने अपना नया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। वह पद्म सम्मान देने वाली स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य भी रह चुके हैं। मंसूर को भाजपा ने इसी साल उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनाया था। दरअसल मंसूर को पहले MLC फिर केंद्रीय पदाधिकारी बनाए जाने के पीछे बीजेपी की पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने की नीति को कारण बताया जा रहा है। मंसूर कुरैशी बिरादरी के मुसलमान हैं। जो कि मुस्लिम समाज में पसमांदा कहलाते हैं, तारिक मंसूर एक पसमांदा मुसलमान हैं, मंसूर ने इस साल की शुरुआत में एएमयू के वाइस चांसलर पद से इस्तीफा दिया था। उन्होंने ये पद 17 मई 2017 को संभाला था, इस पर उन्हें मई 2022 तक पड़ पर रहना था, लेकिन कोरोना के कारण उनका कार्यकाल एक साल के लिए सरकार ने आगे बढ़ा दिया था।
मुसलमानों पर मेहरबानी के पीछे क्या है कारण?
भाजपा लोकसभा चुनाव से पहले मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा को अब भी देश के मुसलमान खुद का विरोधी ही समझते है। मुसलमानों का मानना है कि भाजपा सरकार में उनके साथ ज्यादती होती है। पार्टी अपने इसी छवि को तोड़ना चाहती है। जिसके लिये पार्टी लगातार मुसलमानों को जोड़ने काम कर रही है। पार्टी सभी योजनायें सभी के लिये बिना भेदभाव के संचालित करती है, फिर भी अधिकतर मुसलमान भाजपा से दूरी बनाये हुये है।
भाजपा का मानना है कि केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का ज्यादातर लाभ पसमांदा मुसलमानों को मिलता है। अगर वह साथ आ गए तो चुनाव जीतने में आसानी हो जायेगी। 2019 में देखा गया कि पार्टी कुछ सीटों पर मामूली वोट के अंतर से हार गई थी और उन सीटों पर पिछड़े समाज के मुस्लिम निर्णायक भूमिका में थे। अभी हाल ही में वक्फ बोर्ड ने पसमांदा मुसलमान को काफिर कह दिया था, जिसको लेकर पसमांदा मुसलमान केंद्र सरकार के पास अपनी गुहार लगाने गये थे।