‘गरबा’ का असली मतलब – गरबा का शाब्दिक अर्थ है गर्भ दीप। गर्भ दीप को स्त्री के गर्भ के सृजन शक्ति का प्रतीक माना गया है। इसी शक्ति की मां दुर्गा के स्वरूप में पूजा की जाती है। यह शक्ति साधना का एक तरीका है, जिसे गरबा कहा जाता है। यह नृत्य स्वरुप होता है। इस गरबे के जरिए मां को प्रसन्न किया जाता है। सामान्य तौर पर यह एक आस्था का धार्मिक आयोजन होता है।
किसी ने कहा आप हिन्दू होकर गरबे के लिए मापदंडों की बात कर रहे हो?
मैंने कहा धर्मनिरपेक्ष हिन्दू नही, कट्टर हिन्दू हूँ इसलिए पहले अपना घर सुधारना जरूरी है।
पिछले वर्षों में गरबा के कई बड़े आयोजन जगह-जगह , बड़े होटलों में आयोजित किये गए, जिसमें देखा गया कि कुछ लोग फिल्मी गानों में शेख बनकर नाच रहे थे, समाचार पत्रों ने अच्छे से उन्हें प्रसारित भी किया था। मेरे भाइयों-बहनों आप स्वयं अपने देवी देवताओं का अपमान करोगे और हम चुप रहेंगे ऐसा मत सोचियेगा। गरबा का व्यवसायीकरण करके क्या धर्म का अपमान नहीं हो रहा है, जहाँ देवी आराधना के गीतों पर गरबा किया जाना चाहिये, वहीँ ये व्यवसायी इसे दूषित करने में लगे हुये है, हमारा युवा भटका हुआ है, उसे सिर्फ अपने मनोरंजन से मतलब है, वो धर्म के प्रति जागरूक नहीं है, हमें उनका सही मार्गदर्शन करना चाहिये, जबकि उसी युवा को ये इवेंट करने वाले व्यापारी दिग्भ्रमित करके उनके जरिये धर्म का स्वरूप बिगाड़ने पर तुले हुये है, इन कार्यक्रमों में शामिल होने वाले युवक-युवतियां आधुनिक तन उघाडू कपड़े पहनकर कर फ़िल्मी अश्लील गीतों पर जो नृत्य करते है, वो इस त्यौहार का स्वरूप ख़राब करने में लगे हुये है।
किसी भी समाज में संस्कृति का अपमान करके व्यापार करना बिलकुल गलत है, गरबा का कार्यक्रम बड़ी होटल में होना और समाज की धर्मशाला में ना होना, यह संदेश समाज के लिए सही नही है, इन बड़े आयोजनों में युवाओं से पास के जरिये प्रवेश देने के नाम पर मोटी रकम ली जाती है, जो कि बिलकुल गलत है। इन आयोजनों में असामाजिक तत्व शराब पीकर आ जाते है, गैर हिन्दू भी पास की फीस देकर घुस जाते है, जिसमें हिन्दू युवतियां कई बार लव जिहाद की शिकार होने लगती है। कार्यक्रमों में नशे में धूत युवा अनुचित कृत्यों को अंजाम दे देते है। इन सब पर प्रतिबन्ध लगना चाहिये, या फिर इनमें धर्म के आधार पर सुधार होना चाहिये, ये कार्यक्रम सिर्फ सामाजिक स्थलों और धर्मशालाओं में ही आयोजित होने चाहिये।
लेखक : विजय दुसेजा (संपादक हमर संगवारी)