रायपुर : राज्य में इस समय चुनावी सरगर्मी का माहौल है, जहाँ जो पार्षद बनता है वो महापौर बनना चाहता है, जो महापौर बनता है उसकी इच्छा विधायक बनने की होती है, लेकिन यहाँ दोनों प्रमुख पार्टियों के नेताओं के साथ हमेशा कुछ इस तरह होता आया है, जहाँ रायपुर के नगर निगम में सबसे ज्यादा कांग्रेस पार्टी से महापौर बने हैं। वहां इसे संयोग ही कह सकते हैं कि पांच वर्ष नगर निगम की सरकार चलाने के बाद भी पार्टी को वे नेता चुनावों में जीत नहीं दिला पाये हैं। राज्य गठन के बाद से कांग्रेस ने दो महापौर को विधानसभा और एक को लोकसभा में अवसर दिया है ,लेकिन तीनों ही प्रत्याशियों को बुरी हार का सामना करना पड़ा है। वहीं, भाजपा के महापौर सांसद बनकर प्रदेश की राजनीति में बड़ा चेहरा बन चुके हैं।
राज्य गठन के बाद रायपुर के पहले महापौर तरूण प्रसाद चटर्जी थे। उनका कार्यकाल 4 जनवरी 2000 से 25 दिसंबर 2003 तक रहा। उन्होंने अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार से चुनाव लड़ा लेकिन राजेश मूणत के हाथों करारी हार झेलनी पड़ी थी।
तरूण चटर्जी के बारे में कहा जाता है कि एक बार विद्याचरण शुक्ल के लिए उन्होंने रायपुर ग्रामीण से पांच हजार मतों की बढ़त दिलवाने का ऐलान किया था , जब नतीजे आए तो उस समय शुक्ल के खाते में 5200 की लीड थी। जब भाजपा में आए तब उन्होंने रायपुर लोकसभा सीट से रमेश बैस को श्यामाचरण शुक्ल के खिलाफ 40 हजार की लीड दिलाने का ऐलान टिकट बंटते ही कर दिया था, जो सही साबित हुआ था।
महापौर के बाद किरणमयी नायक ने विधानसभा और प्रमाेद दुबे ने लोकसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमाया लेकिन सफलता नहीं मिली। जबकि, भाजपा के सुनील सोनी महापौर के बाद सांसद बनकर राजनीति ने बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं। कांग्रेस को जीते हुये महापौर विधानसभा में जीत नहीं दिला पा रहे है।
महापौर एजाज ढेबर पर दांव लगाने की चर्चा :
प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने छत्तीसगढ़ में दोबारा सरकार बनाने के लिए भाजपा का अभेद किला कहे जाने वाले शहर के दक्षिण विधानसभा से प्रगति यात्रा की शुरुआत कर चुनावी शंखनाद किया था, यहाँ लगातार बृजमोहन अग्रवाल जीतते हुये आये है। यात्रा की अगुवाई खुद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किया था। उस दौरान से ही इस सीट से महापौर एजाज ढेबर को प्रत्याशी बनाने की चर्चा होने लगी थी। हालांकि, महापौर ने उत्तर और दक्षिण विधानसभा से दावेदारी पेश किया है। जानकारों का कहना है कि राजधानी में महापौरों के पुराने रिकार्ड को देखते हुए महापौर ढेबर को विधानसभा का टिकट मिलने की उम्मीद काफी कम है।
कौन, कब और कहां से हारा है :
तरूण प्रसाद चटर्जी: तरूण प्रसाद चटर्जी वर्ष 1980 में रायपुर ग्रामीण से पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे और उन्होंने एकतरफा जीत दर्ज कर विधायक बने। उसके बाद से रायपुर ग्रामीण सीट लगातार तरुण दादा के ही कब्जे में रही। 1989 में जनता दल से लड़े और चुनाव जीते। 1993 में सुंदरलाल पटवा का नेतृत्व स्वीकार कर भाजपा के सदस्य बने। 1998 में वह भाजपा के विधायक कहलाये। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वे भाजपा के 13 विधायकों के साथ दलबदल कर अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार में शामिल हो गए। इस दौर में जोगी शासनकाल के खिलाफ भाजपा ने आक्रामक अभियान चलाया और वर्ष-2003 चुनाव में तरुण चटर्जी को हार का सामना करना पड़ा। नहीं तो तरुण दादा की जमीनी पकड़ काफी अच्छी थी।
किरणमयी नायक :
वर्ष 2010 में किरणमयी नायक पहली बार महिला महापौर बनीं। उनका कार्यकाल वर्ष 2015 तक रहा। वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सबसे प्रतिष्ठापूर्ण सीट रायपुर दक्षिण से महापौर किरणमयी नायक को मौका दिया, लेकिन वे बृजमोहन अग्रवाल का किला ढहाने में नाकाम रहीं। शहर के मतदाताओं का रुझान चुनाव के आधार पर बदल जाता है, इस हार से यही समझने योग्य है, राज्य गठन के बाद सरकारें आईं और गईं लेकिन रायपुर दक्षिण विधानसभा के उम्मीदवार बृजमोहन अग्रवाल का कोई तोड़ नहीं निकल सका। वे लगातार यहाँ से चुनाव जीतते रहे है, इसका मुख्य कारण इस क्षेत्र का वोटबैंक भाजपा समर्थित माना जाता है, जिसके कारण रमेश बैस भी रायपुर से 7 बार सांसद रह चुके है।
प्रमोद दुबे :
रायपुर लोकसभा सीट पर वर्ष 2019 में दो महापौर के बीच मुकाबला हुआ था। भाजपा ने पूर्व महापौर सुनील सोनी को प्रत्याशी बनाया, वहीं कांग्रेस ने वर्तमान में रहे महापौर प्रमोद दुबे पर दांव खेला। 17वीं लोकसभा चुनाव की मतगणना शुरू होते ही रायपुर सीट पर कांग्रेस लगातार पिछड़ती नजर आने लगी। भाजपा प्रत्याशी सुनील सोनी तीन लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से आगे रहे। वोटों का बढ़ता फासला देखकर कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद दुबे ने फैसला आने से पहले ही हार मान ली। यह विधानसभा भी भाजपा का अभेद्य किला है।
पार्षदों की दावेदारी हो जाती है फेल :
रायपुर नगर निगम सीमा की चारों विधानसभा के पिछले चार चुनावों में ज्यादातर विधायक निगम की राजनीति से बाहर के रहे हैं। 20 वर्षों में कांग्रेस ने तीन नेताओं को मौका दिया है, लेकिन इनमें से कुलदीप जुनेजा ही पार्षद से विधायक बन पाए हैं। वहीं, भाजपा ने अब तक किसी भी पार्षद को मौका नहीं दिया है। भाजपा सभी नेताओं को एक अलग सांचे में तैनात रखती है, जबकि राज्य गठन के समय से ही छत्तीसगढ़ के अधिकतर मतदाता हमेशा कांग्रेस के पक्ष में ही रहे है, फिर भी कम अंतर से भाजपा ने जीत दर्जकर 15 साल शासन कर लिया है।
पिछले डेढ़-दो दशक से निगम की राजनीति कर रहे कई पार्षद हर बार विधानसभा चुनाव के लिए मजबूत दावेदारी करते हैं, लेकिन दिग्गज नेताओं के आगे फेल हो जाते हैं। इस बार महापौर एजाज ढेबर, प्रमोद दुबे, नागभूषण यादव, श्रीकुमार मेनन, ज्ञानेश शर्मा, अजीत कुकरेजा, सतनाम पनाग, आकाश तिवारी तथा भाजपा से नेता प्रतिपक्ष मीनल चौबे, सूर्यकांत राठौर, मृत्युंजय दुबे, डा. प्रमोद साहू, विनोद अग्रवाल ने टिकट की दावेदारी किया है।