रायपुर : सबसे पहले जानते है छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार आई कैसे, जब अटल जी ने छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण किया था तो यहाँ विधानसभा सीटें कांग्रेस की ही ज्यादा थी, उस समय अटल जी को कई बार उनके सलाहकार मंडल ने समझाया की इस समय छत्तीसगढ़ का निर्माण रोका जाये क्यूंकि नियमानुसार यहाँ भाजपा की सरकार नहीं बन सकती लेकिन अटल जी ने कहा, हम अपना वादा जरुर पूरा करेंगे और उन्होंने छत्तीसगढ़ को म.प्र. से अलग करके राज्य वासियों को नये राज्य की सौगात दे दी और उस समय नियमानुसार कांग्रेस की सरकार बनी और अजित जोगी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वर्ष 2003 तक जोगी जी के शासन से आम जनता त्रस्त हो चुकी थी और भाजपा का राज्य नेतृत्व पस्त हो चूका था, सभी भाजपाइयों में हताशा आ चुकी थी, उस समय का शासन कैसा था उसे लिखना आवश्यक नहीं।
तब कांग्रेस से हटकर विद्याचरण शुक्ला ने साहस दिखाया और NCP को राज्य में खड़ा किया, देखते ही देखते उन्होंने 90 सीटों पर 90 प्रत्याशी खड़े कर दिये, जब अकेले विद्याचरण इतना साहस कर सकते है तो भाजपा की पूरी पार्टी क्या कर रही है? तब विद्याचरण शुक्ला के साहस को देखकर भाजपा के हताश कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हो गया और उन्होंने भी पुनः नये उत्साह के साथ खुद को स्थापित किया, इधर विद्याचरण शुक्ला ने कांग्रेस के वोट काटने का काम किया, उधर भाजपा को जीत मिल गई।
राज्य में भाजपा की पहली निर्वाचित सरकार बेहद ही कम वोटों के अंतर से बनी थी, जिसकी जीत का श्रेय विद्याचरण शुक्ला को जाता है, सत्ता में आते ही भाजपा ने अपने लगातार छत्तीसगढ़ का विकास किया और काफी योजनाओं को शुरू किया जिसके बाद छत्तीसगढ़ के आम लोग खुशहाल हुये, इसके बीच भाजपा के कुछ नेताओं के कुछ नेताओं के हाथ बहकने लगे, और सत्ता दुबारा फिर से मिल गई, दूसरी सत्ता के बाद भी भाजपा को तीसरी बार जीत मिली, लेकिन बदलते समय और नेताओं की गलतियों को मुखिया नजर अंदाज करते रहे , इसके बीच गर्भाशय काण्ड, नेत्र कांड और ऐसे बहुत से काण्ड हो गये और सत्ता के मद में नेता और मंत्री अपनी छवि जनता में ख़राब करते गये। उधर मुखिया की चुप्पी पर भी सवाल उठने लगे, धीरे – धीरे जनता में लगातार जनता उन्हीं नेताओं को देखकर जनता भी बोर हो गई और एंटीइंकमबेंसी ने भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। इसमें ध्यान देने योग्य बात यही है कि तीन बार की सत्ता भाजपा को बहुत कम वोटों से मिली है।
इस बार भी भाजपा सत्ता से बाहर क्यूँ रहेगी :
तीन बार की सत्ता में जिन नेताओं की छवि ख़राब हो गई और जिन नेताओं के कारण जनता में एंटीइंकमबेंसी आई उन्हें इस बार फिर से मौका दिया गया है, रमन सिंह को टिकट मिलने से जनता के मन में ये तय हो गया है की रमन ही फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे, जबकि इस बार जनता छत्तीसगढ़िया मुख्यमंत्री ही चाहती है। ऊपर से वही पुराने चेहरे जिनके कारण सत्ता बेदखल हुई थी पार्टी, जिनमें अमर अग्रवाल , बृजमोहन अग्रवाल , राजेश मूणत और अजय चंद्राकर जैसे नाम है, ये सभी नाम अब जनता की पसंद से बाहर हो चुके है, अगर भाजपा को सत्ता में वापसी करनी है तो इन नामों पर फिर से विचार करना होगा। सिन्धी समाज को टिकट ना मिलने से भाजपा का स्थायी वोट बैंक भी काफी मात्रा में कांग्रेस की तरफ जा सकता है।
दूसरी तरफ इन पांच सालों में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में विकास के नाम पर तो कुछ नहीं किया है, लेकिन क्षेत्रीय आधार पर छत्तीसगढ़िया जनता, आदिवासी संस्कृति को महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है, जिसमें छत्तीसगढ़िया त्यौहार पर छुट्टी की घोषणा की , स्कूलों में छत्तीसगढ़िया संस्कृति को महत्व देना, राज्य में छत्तीसगढ़िया को महत्वपूर्ण सम्मान दिलाना, जिसके कारण अधिकतर छत्तीसगढ़िया वोट कांग्रेस के पक्ष में ही रहेंगे। मुस्लिम और इसाई वोट बैंक तो कभी – भी कांग्रेस से कटने से रहे, ये कांग्रेस के स्थाई वोट है ही। मुफ्त की बिजली से कई आम लोग कांग्रेस के पक्ष में है। धान का बोनस बढ़ाने और गीला धान खरीदने के साथ कर्ज माफ़ी को लेकर किसान तो मुख्यमंत्री भूपेश के दीवाने हो गये है। कुल मिलाकर इस बार भी भाजपा के दांव में कमी आ रही है, और सत्ता से बाहर ही रहने के संकेत स्पष्ट है, केन्द्रीय नेतृत्व भी इसमें कुछ नहीं कर पा रहा है, जहाँ चाणक्य माने जाने अमित शाह भी इन पुराने चेहरों के सामने बेबस नजर आ रहे है। भाजपा जब तक इन चेहरों का समाधान नहीं कर सकती, तब उसे नुकसान उठाना ही पड़ेगा, और इनका समाधान भी धर्मसंकट में डालने वाला है। पार्टी सूत्रों के अनुसार उत्तर विधानसभा भाजपा के पक्ष में जीत दर्ज करेगी, पश्चिम विधानसभा में 50-50 का फार्मूला है और लगातार जीत दर्ज करने वाली दक्षिण विधानसभा भाजपा के हाथ से खिसकने वाली है, इसके कई कारण है।
राजस्थान और मध्यप्रदेश में भाजपा :
राजस्थान का इतिहास ही रहा है सत्ता बदलने का, पिछली बार वसुंधरा के कारण भाजपा हारी थी और इस बार वसुंधरा को किनारे कर दिया गया है, ना ही उनका कोई जनाधार बचा है और ना ही पार्टी के कार्यकर्त्ता उनके व्यवहार से खुश है। म.प्र. में शिवराज सिंह चौहान ने खुद में काफी बदलाव किये है और यहाँ भाजपा का जनाधार काफी मजबूत है, यहाँ जातिगत अथवा क्षेत्रिय दिक्कतें नहीं है, यहाँ भाजपा की जीत तय है।
उपरोक्त विश्लेषण आज तक की परिस्थिति के अनुसार है, चुनाव नजदीक आते तक कौन क्या खेलता है, वो वक्त ही तय करेगा, लेकिन जीत के लिये भाजपा बदलाव करना आवश्यक है।