सिन्धी काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने भव्य रूप से मनाई लाल-लोई, जानें क्या होता है यह त्यौहार?

रायपुर : लाल लोई (लोही) पंजाबी शीतकालीन लोक त्यौहार लोहड़ी के लिए सिंधी शब्द है। यह पाकिस्तान के सिंध प्रांत के कुछ हिस्सों में हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है और भारत में सिंधी हिंदुओं द्वारा भी मनाया जाता है। लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। यह मकर संक्रान्ति के एक दिन पहले मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर इस त्यौहार का उल्लास रहता है। आम तौर पर इस पर्व को रात्रि में किसी खुले स्थान में परिवार और समाज के लोगों के साथ मनाया जाता है। यह बुवाई के मौसम के अंत और एक नए कृषि चक्र की शुरुआत का भी प्रतीक है। कृषि से परे, यह त्योहार समुदायों को प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और समृद्धि और उर्वरता के लिए आशीर्वाद मांगने के लिए एक साथ लाता है। छत्तीसगढ़ में इसे छेरछेरा के नाम से मनाते है, यह कृषि प्रधान त्यौहार है।

सिन्धी काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने राधास्वामी नगर झूलेलाल मंदिर में मनाया यह त्यौहार :

सिन्धी समाज भी लाल-लोई के नाम से इस त्यौहार को बड़े ही श्रद्धा भक्ति-भाव के साथ मनाता है, इसे भगवान झुलेलाल को समर्पित करके मनाया जाता है, इसी तारतम्य में लाल-लोई त्यौहार को जगह – जगह मनाया गया, जिसमें सिन्धी काउंसिल ऑफ़ इंडिया जो कि राजधानी रायपुर की जानी-मानी संस्था है, इसके सदस्यों ने भी राधास्वामी नगर श्री झुलेलाल मंदिर में इस त्यौहार को बड़े ही भक्ति-भाव के साथ मनाया। इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में संस्था “सहयोग” के सदस्यों ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। इस अवसर पर समाज की नारी शक्ति ने अग्नि प्रज्वलित कर उसके चारों और परिक्रमा हुए सिंधी गीत गाए, पूजा प्रार्थना की और तेल, गुड़, गजक, रेवड़ी, मूंगफली का प्रसाद वितरण किया गया। इसके पश्चात् मंदिर में भगवान झुलेलाल जी की और शिव जी की पूजा आरती की गई। इस शुभ अवसर पर सिंधी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के प्रदेश अध्यक्ष ललित जैसिंघ ने बताया कि मकर संक्रांति के एक दिन पहले लाल लोई पर्व मनाया जाता है। मकर संक्रांति से शुभ कार्य शुरू हो जाते है। इस मनोरम आयोजन में सिंधी काउंसिल प्रदेश अध्यक्ष ललित जैसिंघ धनेश मटलानी, मुखी चंदर देवानी, मनोहर डेंगवानी, नरेश पंजवानी, रितेश वाधवा, मनीष रोहरा, अनिल जगवानी, कन्हैया खेमानी, सुन्दर दास देवानी, विकास चंगानी, आकाश देवानी, विष्णु नागवानी, विजय देवानी, अनिल डेंगवानी, मनोहर टकरानी, प्रकाश वाधवानी , हितेश डोड़वानी, राहुल असरानी, महेश डेंगवानी शामिल हुये।

साथ ही राधास्वामी नगर पूज्य सिन्धी पंचायत के प्रमुख चंदर देवानी का जन्मदिवस भी था, जिसे केक काटकर सभी सदस्यों ने मिलकर मनाया। इस अवसर पर सिन्धी काउंसिल ऑफ़ इंडिया के प्रमुख ललित जैसिंघ भी मौजूद थे।

लाल लोई पर मेहमान सम्पादक इंदु गोधवानी की कलम से :

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“लाल-लोही”
किसी भी समाज की संस्कृति मेले-त्योहार किसी भी धर्म और संस्कृति की पहचान और विरासत होते हैं, जिससे उस समाज की सार्थकता प्रतिपादित होती है। हमारे देश में विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मिलजुलकर रहते हैं और प्रेम और उत्साह के साथ त्योहार मनाते हैं। इसी तरह भारत के विभिन्न शहरों में रहने वाला ‘सिन्धी समुदाय’ भी विभिन्न परंपराओं और त्योहारों को मनाता है। पंजाब की ही तरह सिन्धु नदी के तट पर स्थित प्राचीन सिन्ध की अर्थव्यवस्था भी कृषि पर आधारित थी, इसलिए फसल से जुड़े कुछ त्योहार है। ऐसा कहा जाता है कि लाल लोही सर्दियों की फसल की कटाई से जुड़ी हुई परंपरा थी। एक अन्य धार्मिक विश्व़ास का मानना है कि यह त्योहार सर्दियों के मौसम के अंत को चिंहित करने के लिए भी मनाया जाता है।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि वैश्व़िक सिन्धी समुदाय हिन्दू धर्म की सामाजिक धारा का एक हिस्सा रहा है, इसलिए सिन्धियों और अन्य हिन्दूओं के बीच बहुत सी समान रीति-रिवाज, परंपराएं और त्योहार है।

सिन्धी समाज के लोग दुनिया भर में धार्मिक और सामाजिक महत्व रखने के लिए जाने जाते हैं। सिन्धी समाज के पास प्रचुर मात्रा में ऐतिहासिक किंवदंतियाँ और शास्त्र हैं, जो दर्शाते हैं कि सिन्धी सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। सिन्धी समाज के लोग अपने त्यौहारों को उत्साह और खुशी के साथ एक अनोखे अंदाज में मनाते हैं।
लाल लोही की रात का दृश्य होलिका दहन या पश्च़िमी दुनिया के शिविर की आग जैसा होता है। बच्चों द्वारा एकत्रित की गई लकड़ियों में अग्नि प्रज्जवलित कर दी जाती है। सिन्धी समाज की महिलाएं इस अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हुए कुछ धार्मिक अनुष्ठान करती है।

“लाल लोही”
लाल लोही पंजाबी शीतकालीन लोक त्यौहार “लोहड़ी” के लिए प्रयुक्त़ सिन्धी शब्द है। सिन्ध में लोहड़ी का त्यौहार लाल लोही के नाम से भी मनाया जाता है। लाल लोही भी लोहड़ी तथा होलिका दहन के जैसे ही अलाव जलाने के जैसा ही अलाव का त्यौहार है। हालांकि “लाल लोही” साल का पहला सिन्धी त्योहार है, लेकिन फिर भी कम ही सिन्धी त्योहार सर्दियों के मौसम में मनाये जाते है। वास्तव में मकर संक्रान्ति के भव्य तरीके से मनाया जाने वाले हिन्दू त्योहार या तो एक दिन बाद या उसी दिन मनाये जाने वाले त्योहारों ने इस सिन्धी त्योहार की चमक को कुछ फीका कर दिया है। लाल लोही पंजाब और भारत के अन्य उत्तरी भागों में मनाए जाने वाले मकर संक्रांति और लोहड़ी से मिलती जुलती है। लाल लोही अत्यधिक महत्वपूर्ण त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाई जाती है।

सिन्धियों का मानना ​​है कि लाल लोही का उद्देश्य लाल-लोही के दिन पुरानी चीज़ों से छुटकारा पाना और तिरमूर (मकर संक्रांति) के त्यौहार की तैयारी में बुराईयों गलत विचारों ओर अपने अहंकार का त्याग कर मन को शुद्ध करना होना चाहिए, जिसे सभी सिन्धी लाल लोही के अगले दिन मनाते हैं। तिरमूर मकर संक्रांति का सिन्धी नाम है। सिन्धियों के लिए मकर संक्रांति का मतलब भगवान सूर्य की पूजा करना है और इस दिन पतंग उड़ाना है। सिन्धी समाज के लोगों द्वारा “लाल लोही” का त्योहार प्रमुखता से मनाया जाता है। इस दौरान बच्चों द्वारा अपने दादा-दादी, चाचा-चाची, रिश्तेदारों एवं पास-पड़ोस के लोगों से लकड़ियाँ एकत्रित करके लाते हैं और रात्रि में सर्वप्रथम समाज के पंडित जी अथवा पंडित जी की अनुपस्थिति में समाज के किसी भी बुजुर्ग सदस्य या किसी भी गणमान्य द्वारा दीप प्रज्वलन कर आरती से कार्यक्रम की शुरुआत की जाती है। तत्पश्च़ात विधि-विधान पूर्वक पूजा अर्चना कर उन एकत्रित की गई लकड़ियों में पवित्र अग्नि से “लाल लोही” को प्रज्जवलित किया जाता है एवं उसमें तिल, चिक्की, रेवड़ी, गजक, लड्डू तथा अन्य मिष्ठान इत्यादि को अर्पित किया जाता है एवं सिन्धी समाज के लोग अपने-अपने घरों से एक-एक लकड़ी आहुति के रुप में “लाल लोही” में अर्पित करते है।

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कुछ महिलाएं मनोकामना पूर्ण होने पर पवित्र अग्नि में नारियल चढ़ाती हैं और प्रसाद ‘सेसा’ इत्यादि का भी वितरण करती है। समाज में पिछली “लाल लोही” के बाद विवाह करने वाले नवविवाहित जोड़ों, माता-पिता के साथ नवजात शिशुओं द्वारा “लाल लोही” की परिक्रमा की जाती है। सभी लोग उस पवित्र अग्नि की परिक्रमा करते हुए फेरे लेते है तत्पश्च़ात पल्लव में सभी परिवारों तथा सम्पूर्ण समाज के लिए आने वाले उत्तरायण में सुख-शांति एवं धन-धान्य तथा समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। रेवड़ी-गजक, खजूर इत्यादि प्रसाद वितरित किया जाता है। समाज के सभी सदस्य मिलकर नाचते गाते हुए सिन्धी लोक नृत्य छेज किया जाता है और आनंद मनाया जाता है।
संकलन एवं साभार प्रस्तुति :
इन्दू गोधवानी..रायपुर : 9425514255