साईबर ठगों ने बताया वो तरीका जिससे जाल में फंसकर लोग अपनी आजीवन पूंजी गँवा रहे है, जानें बचने का तरीका।

आगरा (उ.प्र.) : साईबर ठगों ने आम लोगों को लगातार मुसीबतों में डाला है, वे उनके जीवन की पूरी पूंजी को ठग लेते है। वहीँ अब इस मामले में बड़ा खुलासा हुआ है, जानकारी के अनुसार साईबर ठग बैंक अधिकारी बनकर मोबाईल पर एपीके फाइल डाउनलोड करवाते थे। फिर वो लोग रात के समय 12 से 2 बजे के बीच मोबाईल का एक्सेस प्राप्त कर खाते खाली कर देते थे, जबा लोग इन्टरनेट चालू करके सो जाते थे। फिर मोबाईल पर आए ओटीपी को भी डिलीट कर देते थे। दयालबाग के सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी से 15 लाख रुपये की साईबर ठगी इसी तरह हुई थी। ये कार्य इस तरह से होता था, जैसे दूर बैठे दो लोग आपस में दो कंप्यूटरों को आपस में जोड़ लेते थे। गिरोह के दो सदस्यों को शुक्रवार को साईबर क्राइम थाने की पुलिस ने गिरफ्तार किया है।

इनमें सागर, मध्य प्रदेश निवासी बीआर्क का छात्र देवेश भी शामिल है। वह आर्किटेक्ट बनने के बजाय साईबर ठग बन गया। गिरोह का मास्टरमाइंड गोल्डी सागर बड़ा बिल्डर है। पुलिस उसकी तलाश में भी लगी हुई है। वह विदेश में रकम डाॅलर में परिवर्तित कर क्रिप्टोकरेंसी खरीद लेता है। नोडल अधिकारी साईबर क्राइम एडीसीपी आदित्य सिंह ने पुलिस लाइन में इस बारे में बात की। ये लोगों को लगातार apk फाइल भेजकर इंस्टाल करवाते थे।

उन्होंने बताया है कि अगस्त माह में दयालबाग निवासी पंजाब नेशनल बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी राजेंद्र प्रसाद शर्मा से कॉल कर धोखाधड़ी की गई थी। उनसे कहा गया था कि क्रेडिट कार्ड का सत्यापन करना है। व्हाट्सएप पर एक एपीके फाइल भेजी गई है। उसे डाउनलोड कर पढ़ने के लिए बोला तो वह झांसे में आ गए। ओपन करते ही आरोपी के पास उनके मोबाईल का एक्सेस पहुंच गया, यह एपीके फाइल मोबाइल एप होता है। वहीँ फिर रात करीब 12 से 2 के बीच आरोपियों ने ई-वालेट और नेट बैंकिंग की जानकारी लेकर खाते से 15 लाख रुपये ट्रांसफर कर लिये। मोबाईल पर आए ओटीपी को भी डिलीट कर दिया। थाना साइबर क्राइम में प्राथमिकी दर्ज की गई। तीन खातों में रकम गई थी। खातों की जानकारी के बाद सागर, मध्य प्रदेश निवासी देवेश यादव और आशीष रजक को गिरफ्तार किया गया।

मोबाइल में मिली 40 डेबिट कार्ड की जानकारी :

एडीसीपी ने बताया कि 2 लाख रुपये सागर, एमपी के मनीष यादव के खाते में ट्रांसफर हुए थे। उसका खाता कोटक महिंद्रा बैंक में था। उसकी गिरफ्तारी के प्रयास किए गये, लेकिन वो मिला नहीं। मनीष के खाते से रकम सागर के ही देवेश के खाते में गई थी। उसे पकड़ लिया गया है। उसके मोबाईल में एपीके फाइल, 30-40 डेबिट कार्ड की जानकारी थी। व्हाट्सएप चैट भी मिली है, जिसमें वो खातों की 1 से 5 लाख रुपये रुपये लिमिट की बात कर रहा था।

खुलवाए 80 खाते, सिम भी पास रखते थे :

वहीँ इस मामले में पुलिस ने बताया है कि आरोपी आशीष रजक ही खाते उपलब्ध कराता है। देवेश बीआर्क का छात्र है। उसने गवर्नमेंट काॅलेज से आर्किटेक्ट में डिप्लोमा कर रखा है। वह एक काल सेंटर में काम करता था। अपने खर्च पूरे नहीं कर पा रहा था। इससे साईबर ठगी का रास्ता पकड़ लिया। इन मामलों में उसे कमीशन मिलता था। एक कंपनी में वर्तमान में ऑनलाईन आर्किटेक्ट का काम करता है। इसके लिए वह ऑफिस नहीं जाता है। पूछताछ में सामने आया कि उन्होंने साईबर ठगी के लिए 70-80 खाते खुलवाए हैं। वह चेकबुक, डेबिट कार्ड, रजिस्टर्ड सिम अपने पास रखते हैं।

इन खातों में साईबर ठगी की रकम को ट्रांसफर करते हैं। उन्होंने पिछले छह महीने में 80-90 लाख रुपये की धोखाधड़ी लोगों से कर रखी है। रकम को स्वैप मशीन के माध्यम से विदेश के खातों में ट्रांसफर करते हैं। इसे यूएस डाॅलर में परिवर्तित करते हैं। इसके बाद क्रिप्टोकरेंसी में बदल देते हैं, फिर जरूरत पड़ने पर उसे रुपयों में बदलकर अपने खातों में हस्तांतरित कर लेते है।

मोबाइल की स्क्रीन हो जाती है ब्लैंक :

आरेापी देवेश की पहचान इंदाैर के गोल्डी से हुई। वह मास्टरमाइंड होने के साथ ही बिल्डर भी है। उसके तार झारखंड के जामताड़ा के गिरोह से जुड़े हुए हैं। उसने एक ऑफिस बना रखा है। इसमें पेशेवर युवकों को नाैकरी पर रखता है। उनसे एपीके फाइल बनवाता है। इसके बाद बड़ी संख्या में मोबाईलों पर भेजता है। मोबाइल का एक्सेस मिलने पर हैक कर खाते खाली कर देता है। देवेश आगरा के लोगों को शिकार बनाता था। रात में 12 से 2 के बीच मोबाईल ओपन करने पर स्क्रीन ब्लैंक हो जाती है, जिससे मोबाईल धारक हैंग होना समझ लेते है। इस दाैरान आरोपी अपने खाताधारक को जोड़ लेते हैं। मोबाइल एक्सेस होने के कारण ओटीपी को डिलीट कर देते हैं। गोल्डी का साथी मनीष भी है।